मुख्यपृष्ठस्तंभतीर-ए-तौसीफ : मुखौटे पर मुखौटे ...साम-दाम-दंड-भेद की राजनीति और दोहरे चरित्र का...

तीर-ए-तौसीफ : मुखौटे पर मुखौटे …साम-दाम-दंड-भेद की राजनीति और दोहरे चरित्र का सच!

तौसीफ कुरैशी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब अरब मुल्कों के शेखों से मिलते हैं तो वैâमरे मुस्कान पकड़ते हैं, अरबी में खैरमकदम होता है और अंग्रेजी में लिखा जाता है प्Aझ्झ्भ् ऊध् ेंEथ्ण्ध्श्E! यह स्वागत सिर्फ शेखों का नहीं होता, यह उस अंतरराष्ट्रीय छवि का स्वागत होता है, जिसे बड़े जतन से गढ़ा गया है। मगर यही प्रधानमंत्री जब सोमनाथ की धरती पर खड़े होकर भारत के मुसलमानों को निशाने पर लेते हैं, तब हजार साल पहले के जख्म कुरेदे जाते हैं। तब इतिहास को हथियार बनाया जाता है और वर्तमान को जहर से भर दिया जाता है।
और कितने मुखौटे?
यह कोई चूक नहीं है, यह रणनीति है। यही वह दोहरा चरित्र है, जिसकी हदें अब बार-बार लांघी जा रही हैं।
देश के भीतर नफरत बोली जाती है और देश के बाहर भाईचारे की भाषा (अपने भाई को लेने आया हूं)। घर में आग और बाहर अगरबत्ती। प्रधानमंत्री के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ‘बदला’ लेने की बात करते हैं, और प्रधानमंत्री चुप रहते हैं। चुप्पी भी सहमति होती है यह लोकतंत्र का पहला सबक है। पिछले ग्यारह-बारह वर्षों में प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने जो सबसे स्थायी काम किया है, वह है समाज को बांटना। कपड़ों से पहचानने की बात, श्मशान-कब्रिस्तान, ईद-होली, दिवाली तक में फर्क पैदा करना, मंगलसूत्र छीनने, भैंस-बकरी-झोटा चुराने जैसे बयान ये सब किसी फिसलन के नतीजे नहीं, बल्कि सुनियोजित राजनीति के औजार हैं।
और हैरानी की बात यह है कि जो भाषा किसी चौराहे के नारेबाज को भी शर्मिंदा कर दे, वही भाषा सत्ता के शिखर से बोली जा रही है। जो लोग यह जहर घोलते हैं, उन्हें संरक्षण मिलता है और जो सवाल पूछते हैं, उन्हें देशद्रोही ठहराया जाता है। यह लोकतंत्र नहीं, यह डर का अनुशासन है। अरबों के शेखों की बात छोड़िए। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को अपने शपथ ग्रहण में बुलाया जाता है और फिर बिना बुलाए या बुलावे की शर्तें तोड़कर पाकिस्तान की शादी में पहुंच जाया जाता है। कूटनीति का यह कौन सा सिद्धांत है? दरअसल यह सिद्धांत नहीं, अवसरवाद है। जहां लाभ दिखा, वहां झुक गए, जहां वोट दिखा, वहां जहर घोल दिया।
यही है मुखौटे पर मुखौटे की राजनीति। इस राजनीति की जड़ें आरएसएस के उस सूत्र में हैं (साम- दाम-दंड-भेद। साम यानी समझा-बुझाकर अपने पक्ष में करना, दाम यानी लालच देकर, दंड यानी डरा धमकाकर और सजा का भय दिखाकर, भेद यानी समाज को बांटकर, एक को दूसरे से लड़ाकर।)
आरएसएस को समझने के लिए उसके वर्तमान भाषण नहीं, उसका अतीत पढ़ना होगा। वह समय-समय पर अपना चरित्र बदलता रहा है। कभी राष्ट्रवाद का चोला, कभी विकास का, कभी संस्कृति का और जब कुछ भी काम न आए तो खुली नफरत का। इस सफर में समाजवादियों का भी उसने भरपूर इस्तेमाल किया, जहां जरूरत पड़ी, उन्हें मोहरा बनाया और सत्ता मजबूत होते ही उन्हें हाशिये पर फेंक दिया। इतिहास गवाह है जो साथ चला, वह अंतत ‘यूज एंड थ्रो’ का शिकार हुआ।
जवाबदेही से डर!
सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि जिस पर आईना दिखाने की जिम्मेदारी है वह भी वही नफरती भाषा बोल रहा है पत्रकार का काम सत्ता से दोस्ती करना नहीं, उसकी आंख में आंख डालकर सवाल पूछना है मगर आरएसएस ने अखबारों में भी अपनी झूठ और फरेब की चाशनी में तैयार किए गए संघियों को फिटनेस कर दिया है वहां भी नफरतियों को संरक्षण दिया जाता है। आज सवाल यह है कि क्या यह देश दो भाषाओं में चलेगा एक बाहर के लिए, एक भीतर के लिए? क्या प्रधानमंत्री का दिल भी पासपोर्ट देखकर धड़कता है? क्या भारत के मुसलमान इस देश के नागरिक हैं या सिर्फ चुनावी भाषणों का पात्र? जब अरब शेख मुस्कान देखते हैं और भारतीय मुसलमान संदेह, तब समझ लीजिए कि समस्या धर्म की नहीं, सत्ता की है। सत्ता को जब जवाबदेही से डर लगता है, तब वह नफरत का सहारा लेती है। बेरोजगारी से ध्यान हटाने के लिए इतिहास उछालती है, महंगाई छुपाने के लिए मंदिर-मस्जिद की दीवारें खड़ी करती है। नॉन बॉलोजिकल मानव के राज में ये सब हो रहा, समझने की जरूरत है। देश ऐसे नहीं बनते, देश बराबरी से बनते हैं। देश उस भरोसे से बनते हैं, जिसमें प्रधानमंत्री सबका होता है (ईश्वर अल्लाह की परछाई संज्ञा दी जाती है) सिर्फ तालियां बजाने वालों का नहीं।
आज जरूरत है कि इस दोहरे चरित्र को पहचाना जाए। स्वागत-वंदन-अभिनंदन की चमक के पीछे छिपे नफरत के अंधेरे को देखा जाए। क्योंकि अगर लोकतंत्र ने समय रहते सवाल नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ यही पूछेंगी कि क्या हमने मुखौटों को ही चेहरा मान लिया था? सत्यमेव जयते।
(लेखक राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)

अन्य समाचार