बेटी नन्ही सी परी थी जब
नूपुर बजती पायल पहन
घर के आंगन चहकती रहती
पहन घाघरा बुंदकियों वाला
ओढ़नी ओढ़ किनारी वाली
गुनगुनाती डोलती रहती
दादा, काका के कंधों चढ़ती
दादी की गोद में छुप जाती
कभी सखियों संग खेलती
अपनी गुड़िया को सजाती
बुआ अपनी लाडली की नजर उतारे
मां बलैया ले ले जाती
रौनक, खुशियों से भरा रहता
नन्ही दुलारी के बाबा का आंगन।
जंगली अमरबेल सी बढ़ कर
यह नन्ही सी बिटिया
पलक झपकते हुई सयानी
देख बेटी का यौवन अपनों का
मन भर-भर आता
अब होगी पराई बच्ची
घर की देहरी छूट जाएगी
जैसे धान का नन्हा सा बिरवा
एक खेत से निकल
दूसरे के खेत में जम जाएगा
पिता की बाहें दादा का कंधा
मां का आंचल दादी की झोली
सब सूनी हो जाएगी।
बंधेंगे बंदनवार बजेगी शहनाई
होगा कन्यादान, बेटी दूजे घर जाएगी
परिवार जन मनौतियां मनाएंगे
जैसा लाड स्नेह यहां पाया
अपने घर में पाना
जैसे रिश्ते यहां निभाए
अपने घर में जरूर निभाना।
-बेला विरदी
