संजय राऊत
महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव का एक चक्र पूरा हो गया है। नगरपालिका, महानगरपालिका एवं जिला परिषद पर भारतीय जनता पार्टी ने जीत हासिल की। शिवसेना समेत विपक्षी पार्टियां पिछड़ गर्इं और लातूर को छोड़कर एक भी जिला परिषद में विपक्षी पार्टियां जीत नहीं पार्इं। इस पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की प्रतिक्रिया सही है। वे कहते हैं, ‘‘विपक्ष में लड़ने की इच्छाशक्ति नहीं दिखती।’’ इच्छाशक्ति का अभाव ही विपक्षी पार्टियों की हार का मुख्य कारण है, ऐसा फडणवीस कहते हैं तो भी यह पूरी तरह से सच नहीं है। असल में, विपक्षी पार्टियों को चुनाव लड़ना ही नहीं चाहिए, ऐसी परिस्थिति भाजपा ने निर्माण कर दी है। चुनाव में विपक्ष के उम्मीदवारों को उठा ले जाना या चुनकर आने के बाद उस जनप्रतिनिधि को पैसे के जोर पर खरीद लेना। इसलिए विपक्षी दल पिछड़ रहे हैं और अब चुनाव क्यों लड़ा जाए? यही मानसिकता सबकी हो गई है। जिला परिषद के नतीजे के बाद एक वरिष्ठ नेता से बातचीत हुई। उन्होंने कहा, ‘‘भाजपा अब २०२९ की तैयारी कर रही है और उस चुनाव का बजट पहले ही २५,००० करोड़ रुपए तय हो चुका है, जो बढ़ेगा भी। इस खेल में फडणवीस विपक्ष की इच्छाशक्ति का इम्तेहान ही ले रहे हैं। भाजपा राज्य में और देश में सत्ता पर है। फिर भी वे लोकसभा से लेकर ग्राम पंचायतों तक सभी चुनाव जीतना चाहते हैं। जो लोग राजनीति में हैं और मानते हैं कि राजनीति सिर्फ सत्ता पाने के लिए की जाती है, उन्हें चुनाव को युद्ध की तरह लड़ना होगा। जिला परिषद चुनावों में भाजपा २२५ सीटें जीतती है, राष्ट्रवादी १६५ और शिंदे गुट १६२ सीटें जीतकर आगे हो जाती है। यह सिर्फ सत्ता और पैसों से होता है, ऐसा नहीं है। मुंबई महानगरपालिका चुनावों में शिवसेना से शिंदे गुट में शामिल हुए लगभग सभी पूर्व नगरसेवकों का पराभव जनता ने किया। ये नगरसेवक पुन: चुनकर आएं, इसके लिए शिंदे गुट ने इफरात पैसा खर्च किया। फिर भी यश नहीं मिला। जिला परिषद चुनावों से पहले छत्रपति संभाजीनगर में शिवसेना के एक जिलाप्रमुख राजू राठौड़ ने दलबदल किया और वे शिंदे गुट में शामिल हो गए। जिला परिषद चुनाव में उनके गोंदेगांव सीट आरक्षित होने के कारण इस सीट से उनका पत्ता पहले ही कट गया। उन्होंने अपनी बेटी को पड़ोस के अमखेड़ा सीट से चुनाव लड़ाया। मतगणना वाले दिन शाम को श्री. अंबादास दानवे का फोन आया। उन्होंने कहा, ‘‘राजू राठौड़ के हनुमंतखेडा गांव की गोंदेगांव सीट से अपनी शिवसेना की उम्मीदवार सुनीता चव्हाण चुनी गई हैं। इतना ही नहीं, राजू राठौड़ की बेटी अमखेड़ा सीट से बुरी तरह हार गई हैं।’’ मैंने गोंदेगांव गुट से विजयी हुई उम्मीदवार की जानकारी ली है। दानवे ने कहा, ‘‘तमाशा (नाटक) में काम करने वाली एक सीधी-सादी कलावंत महिला ने शिंदे गुट के अमीर उम्मीदवार को हराया है।’’ राठौड़ को पूरा विश्वास था कि उनके उम्मीदवार अपनी धनशक्ति के दम पर संभाजीनगर के गोंदेगांव और अमखेड़ा दोनों गुट से चुने जाएंगे। हालांकि, मतदाताओं ने उन्हें धूल चटा दी। शिवसेना ने राठौड़ के गांव की सौ. सुनीता चंद्रशेखर चव्हाण को उम्मीदवारी दी। उनके घर के हालात ठीक नहीं थे। पति चंद्रकांत सरकारी एंबुलेंस पर कॉन्ट्रैक्ट पर ‘पार्ट टाइम’ नौकरी करते हैं। पत्नी घर का काम और छोटी-मोटी मजदूरी करती हैं। चंद्रशेखर चव्हाण का एक छोटा सा लोककला प्रदर्शन समूह है। सुनीता चव्हाण भी उसमें काम करती हैं। शादी समारोहों और अंतिम संस्कार की यात्रा में गीत और भजन गाने का काम यह दंपति करता है, लेकिन सुनीता चव्हाण ने राजू राठौड़ द्वारा नामित शिंदे गुट की उम्मीदवार पूजा वाघ को भारी मतों से पराजित किया। तात्पर्य यह है कि चुनाव सिर्फ पैसे के दम पर नहीं जीते जाने चाहिए। राठौड़ जैसे कई उदाहरण हैं। परभणी में ‘अमीर’ वरपुडकर परिवार के पांच लोगों को जनता ने हरा दिया। अगर लड़ने की जिद और प्रेरणादायी नेतृत्व हो तो राजनीति में पैसा सूखे पत्तों की तरह उड़ जाता है।
नेपोलियन की कब्र
आज निष्ठा और विचार कहीं नहीं बचा है। ‘बचेंगे तो और भी लड़ेंगे’, ऐसा दत्ताजी शिंदे ने पानीपत के मैदान में कहा था। अब ‘लड़ेंगे’ खत्म हुआ और सब ‘बचेंगे’ की राह पर निकल पड़े हैं। सब अपनी जागीरें और खाल बचाना चाहते हैं। एक अनजान द्वीप पर नेपोलियन की मौत हो गई। उसकी कब्र को ब्रिटिश आर्मी ने घेर लिया था। नेपोलियन के डॉक्टर और अन्य सरदार फ्रांस लौट गए, लेकिन कुछ निष्ठावान सैनिक और सेवक अपने राजा के प्रेम में वहीं रुक गए। उनमें से कुछ सेवक इतने कट्टर थे कि नेपोलियन के अवशेष को वे १८ साल बाद फ्रांस ले आए। तब तक वे उस कब्र की सेवा करते रहे। उनमें से कुछ की वहीं मौत हो गई, जबकि बचे हुए सैनिक नेपोलियन की अस्थियां फ्रांस लाने के बाद लौट गए। कहने का मतलब है कि आज की राजनीति में दत्ताजी शिंदे, नेपोलियन नहीं रहे और ऐसे वफादार सैनिक भी नहीं बचे हैं। सेना पेट पर चलती है, लेकिन अब चुनाव की सेना सिर्फ पैसे के बंडलों पर चलती है। फिर भी किसी फटेहाल उम्मीदवार की विजय होती है, यह कई जगहों पर देखा गया है।
भाजपा का ‘बूथ’ नेटवर्क
मुंबई और कुछ अन्य महानगरपालिकाओं को छोड़ दें तो विपक्ष ने स्थानीय निकाय चुनावों को गंभीरता से नहीं लिया। कार्यकर्ता स्थानीय स्तर पर लड़े और जीते या हारे, लेकिन सरस भाजपा ही रही। ग्रामीण इलाकों में भारतीय जनता पार्टी ने ‘बूथ’ लेवल पर कार्यकर्ताओं का नेटवर्क बनाया। जहां कार्यकर्ता नहीं थे, वहां दूसरी पार्टियों के लोगों को सीधे खरीद लिया गया। चुनाव जीतते समय भाजपा किसी नियम का पालन नहीं करती। भाजपा ने ग्रामीण महाराष्ट्र के सभी ‘रसूखदार’ लोग, कारखानदार को अपनी पार्टी में खींच लिया। वे उनके दम पर चुनाव जीत रहे हैं। फडणवीस समेत भाजपा के सभी प्रमुख नेता ग्रामीण इलाकों में जाते हैं और कार्यक्रम लागू करते हैं। चुनाव लड़ना ही उनका एकमात्र कार्यक्रम है। एकनाथ शिंदे के लिए हर चुनाव वजूद की लड़ाई होती है और वह उसी हिसाब से अपनी ‘स्ट्रेटेजी’ तय करते हैं। फिर उनके पास पैसों का बल तो है ही। शिंदे गुट को जिला परिषद चुनाव में १६२ सीटें मिलीं। रत्नागिरी और रायगड में उनकी सत्ता आई तो भाजपा ने सिंधुदुर्ग पर कब्जा कर लिया। शरद पवार की पार्टी विलीनीकरण की गुत्थी में उलझ गई। पुणे में तो वे जीत गए, पर लोग उनकी राजनीति को क्या अब गंभीरता से लेंगे? यही सवाल है। अजीत पवार की अपघाती मौत से सहानुभूति की लहर निर्माण हुई और उनकी पार्टी ने १६५ सीटें जीतीं, अगर यह मान भी लें तो भी महाराष्ट्र की राजनीति में असली शिवसेना का पिछड़ जाना राजनीतिक संतुलन को बिगाड़ रहा है। शिवसेना का पिछड़ना मतलब महाराष्ट्र को दिशा देने वाले विचारों का पिछड़ना है। शिंदे का नेतृत्व ठाकरे से बड़ा नहीं है। फिर भी हर चुनाव में शिंदे आगे रहते हैं, ये चमत्कारिक है। चुनाव में पैसा देने वाले और चुनाव जिताने वाले को ही नेता मानने की एक नई परंपरा बन रही है। चुनाव लड़ने और जीतने की भूख राजनीतिक दलों के नेतृत्व में होनी ही चाहिए। वह भूख आज सबसे ज्यादा भाजपा, शिंदे गुट और अजीत पवार की पार्टी में दिखाई देती है। अगर महाराष्ट्र की राजनीति में बढ़ी हुई यह भूख ही विपक्षी पार्टियों के पिछड़ने का कारण है तो इसके लिए केवल सत्ताधारियों को दोष देना गलत है। तलवार से तलवार भिड़ानेवाला नेतृत्व ही अब महाराष्ट्र में टिकेगा।
जनभावना यह है कि स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान उद्धव और राज ठाकरे ने पूरे महाराष्ट्र का दौरा किया होता, तो नतीजों के आंकड़े निश्चित ही बदल गए होते। यह सच है कि मोदी, शाह, फडणवीस-शिंदे ने राजनीति का पूरी तरह से व्यापारीकरण कर दिया है। फिर भी उनके लोग बड़े पैमाने पर पराजित हुए और सुनीता चव्हाण जैसे सीधे-सादे उम्मीदवार को लोग आज भी चुनते हैं। पैसे वालों की टक्कर में एक पैसे वाले की हमेशा हार होती है, ये रायगढ़ और सिंधुदुर्ग में दिख गया। पुणे-बारामती में भाजपा हार गई। वहां कई पैसे वाले अपनी जमानत राशि भी नहीं बचा पाए। आखिर में आत्मबल और पक्का इरादा जरूरी है। हरिशंकर परसाई ने कहा है, ‘‘आत्मविश्वास कई तरह का होता है। पैसे का, सत्ता का, ताकत का और ज्ञान का… लेकिन मूर्खता का आत्मविश्वास ‘सर्वोपरि’ अर्थात सुप्रीम होता है।’’
महाराष्ट्र में ऐसे आत्मविश्वास की फसल आ गई है!
जनता को मूर्ख बनाया जा रहा है और मूर्ख बनने के लिए जनता तैयार है!
