अनिल तिवारी
क्रिकेट को कभी सज्जनों का खेल कहा जाता था। खिलाड़ी हारते थे, जीतते थे, बहस करते थे, फिर हाथ मिलाकर मैदान छोड़ देते थे। लेकिन विशाखापत्तनम की घटना ने बता दिया कि अब समस्या क्रिकेट के नियमों में नहीं, समाज के मनोविज्ञान में है। एक स्थानीय मैच में रन-आउट के निर्णय पर विवाद हुआ और अंपायर की हत्या कर दी गई। यह केवल एक अपराध नहीं, खेलभावना की हत्या है। अंपायर का निर्णय गलत भी हो सकता है, पर उसका उत्तर बल्ले, बहस या अपील से दिया जाता है, चाकू से नहीं। मैदान में निर्णय से असहमति स्वाभाविक है, लेकिन निर्णय देने वाले की जान ले लेना बताता है कि गुस्सा अब तर्क से बड़ा हो चुका है। गलियों और मोहल्लों का क्रिकेट भी अब वही आक्रामकता ढो रहा है, जो टीवी स्क्रीन, सोशल मीडिया और भीड़ की उत्तेजना से रोज बढ़ती है। इस घटना से सबसे बड़ा सवाल उठता है कि क्या हम खेलना भूल गए हैं? जब स्थानीय मैच में अंपायर सुरक्षित नहीं, तो बच्चों और युवाओं को खेल से संस्कार वैâसे मिलेंगे? खेल मैदान अनुशासन सिखाने की जगह यदि हिंसा का अखाड़ा बन जाए, तो दोष सिर्फ एक आरोपी का नहीं, उस सामाजिक माहौल का भी है जहां हार सहने की क्षमता खत्म होती जा रही है। क्रिकेट में रन-आउट का पैâसला कभी-कभी विवादित हो सकता है, लेकिन इंसानियत का पैâसला साफ है कि एक निर्णय के लिए किसी की जान लेना सभ्य समाज के मुंह पर तमाचा है। स्थानीय टूर्नामेंटों में सुरक्षा, आयोजकों की जिम्मेदारी और विवाद निपटाने की स्पष्ट व्यवस्था अब अनिवार्य होनी चाहिए। क्योंकि खेल में हार-जीत चलती रहती है, लेकिन यदि मैदान से जीवन ही चला जाए, तो फिर कोई मैच नहीं जीतता।
