मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : हिंसा नहीं, संवेदना बढ़ाएं

तड़का : हिंसा नहीं, संवेदना बढ़ाएं

 

कविता श्रीवास्तव
आज का भारत एक ओर महिला सशक्तिकरण, समान अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर आगे बढ़ रहा है। महिलाओं को आरक्षण देने की बहस हो या कार्यस्थलों पर समान अवसर—हर दिशा में बदलाव की कोशिशें दिख रही हैं। लेकिन इसी समाज का एक दूसरा चिंताजनक चेहरा भी सामने आ रहा है, जहां रिश्तों में बढ़ती कटुता और हिंसा नए सवाल खड़े कर रही है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में एक महिला ने अपने पति पर एसिड फेंक दिया। कथित तौर पर पति-पत्नी के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा था। कारण था परस्पर अविश्वास। पति गंभीर रूप से झुलस गया और उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। यह घटना सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि टूटते रिश्तों और असंतुलित मानसिकता का उदाहरण है।
इसी तरह देश के अन्य हिस्सों से भी कई चौंकाने वाली घटनाएं सामने आई हैं। दिल्ली में एक महिला ने अपने प्रेमी की होने वाली पत्नी पर एसिड अटैक कर दिया। गुजरात के अमदाबाद में भी पत्नी द्वारा पति पर तेजाब फेंकने का मामला सामने आया। ये घटनाएं बताती हैं कि अब हिंसा का दायरा एकतरफा नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक विकृति का रूप लेता जा रहा है।
हाल के समय में पति-पत्नी के संबंधों को टिकाए रखना संकट-सा होता जा रहा है। वैवाहिक विवादों ने भयावह रूप ले लिया है। कुछ मामलों में पतियों की हत्या कर उनके शव को छिपाने के लिए टंकियों या अन्य तरीकों का इस्तेमाल किया गया। ये घटनाएं समाज में बढ़ती असहिष्णुता, अविश्वास और क्रोध की प्रवृत्ति को उजागर करती हैं।
यहां यह समझना जरूरी है कि महिला सशक्तिकरण का अर्थ हिंसा की स्वतंत्रता नहीं है। उसका मतलब है शिक्षा, आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और न्यायपूर्ण व्यवहार। जिस समाज में महिलाएं वर्षों तक अत्याचार का शिकार रही हैं, उसी समाज में यदि वे भी हिंसा के रास्ते पर चलने लगें, तो यह सशक्तिकरण नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन का टूटना है। वास्तविक समस्या ‘पुरुष बनाम महिला’ नहीं है, बल्कि ‘हिंसा बनाम संवेदनशीलता’ है। जब रिश्तों में संवाद खत्म हो जाता है और उसकी जगह शक, अहंकार और गुस्सा ले लेता है, तब ऐसे जघन्य अपराध जन्म लेते हैं। समाधान के लिए हमें कई स्तरों पर काम करना होगा। पहला, परिवार और समाज में संवाद और समझ को बढ़ावा देना होगा।

 

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