मुख्यपृष्ठस्तंभविक्रम-बेताल : सपनों का सुपरपावर या जमीनी संकट का साम्राज्य?

विक्रम-बेताल : सपनों का सुपरपावर या जमीनी संकट का साम्राज्य?

मनमोहन सिंह
अमावस की काली रात में श्मशान का सन्नाटा गीदड़ों की आवाजों से कांप रहा था। राजा विक्रम ने जैसे ही पेड़ से उस भारी शव को उतारा और अपने कंधे पर लादा, बेताल ठहाका मारकर हंस पड़ा। `विक्रम! तू इस शव को ढो रहा है और सुदूर एक साम्राज्य `आंकड़ों के बोझ’ को। चल, रास्ता लंबा है, तुझे एक कहानी सुनाता हूं। पर याद रखना, अगर तूने सच जानते हुए भी मुंह नहीं खोला, तो तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे!’
बेताल की कथा: आंकड़ों का इंद्रजाल
`विक्रम, एक देश है, जहां के मंत्री ढोल पीटते हैं कि वे दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी शक्ति बनने वाले हैं। लेकिन तभी आईएमएफ की अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ आती हैं, जिनकी बातों में `नीम’ जैसी कड़वाहट और सत्य की धार है। अप्रैल २०२६ की एक सुबह, वह आईना दिखाती हैं कि तुम्हारी तरक्की `पूंजी-गहन’ है मशीनों और चंद बड़े हाथों में पैसा बढ़ रहा है, लेकिन आम आदमी की जेब फटी है। उन्होंने `३-जे’ का मंत्र दिया, जमीन, जेहन और जस्टिस। वहां मुट्ठीभर नौकरियों के लिए करोड़ों नौजवान कतार में हैं। जीडीपी का कद तो बढ़ रहा है, पर प्रति व्यक्ति आय में वह देश अपने पड़ोसियों से भी पिछड़ रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट घट रहा है और देश के `ब्रेन’ प्रतिभा विदेश भाग रही है। अब बता राजन! क्या वह देश महान बन रहा है या केवल आंकड़ों की बाजीगरी में फंसा है? जानते हुए भी तूने मुंह नहीं खोल वरना तेरा अंत निश्चित है!’
विक्रम का उत्तर, नीति और ज्ञान का संगम
विक्रम ठहर गया और गंभीरता से बोला, `बेताल! तूने जिस संकट की चर्चा की है, उसका समाधान `कामन्दकीयनीतिसार’ के इस सूत्र और `श्रीमद्भगवद्गीता’ के सार के संतुलन में छिपा है!’
`सदानुरक्तप्रकृतिः प्रजापालनतत्पर:।
विनीतात्मा हि नृपतिर्भूयसी श्रियमश्नुते ।।
`अर्थात, वास्तविक `श्री’ यानी स्थायी समृद्धि केवल उस राजा को मिलती है, जो इन तीन स्तंभों को संतुलित रखे। विनीतात्मा का अर्थ है सत्य का स्वीकार। यानी कामन्दक कहते हैं राजा को `विनीत’ विनम्र होना चाहिए। गीता में श्रीकृष्ण ने `स्थितप्रज्ञ’ रहने का उपदेश दिया है, जो प्रशंसा में फूले नहीं और आलोचना, जैसे गीता गोपीनाथ की सलाह से विचलित न हो। यदि राजा अहंकार में आकर कड़वे आंकड़ों को ही नकार दे, तो वह `विनीतात्मा’ नहीं रहा। सुधार की पहली शर्त सत्य को स्वीकारना है।’ `प्रजापालनतत्पर का अर्थ है प्रजापालन। प्रजापालन का फल। प्रजापालन कर्म हुआ, फल बनाम कर्म, गीता का मंत्र है `कर्मण्येवाधिकारस्ते।’ आज के नीति-निर्माता केवल `फल’ यानी बड़े आंकड़ों के प्रदर्शन में तत्पर हैं, जबकि उनका असली `कर्म’ बुनियादी सुधार, शिक्षा और स्वास्थ्य था। जब राजा `फल’ के मोह में `प्रजापालन’ के अपने प्राथमिक कर्तव्य को भूल जाता है, तो अर्थव्यवस्था का ढांचा दीमक लगी नींव जैसा हो जाता है।’ `सदानुरक्तप्रकृति को लोक-कल्याण का यज्ञ माना जा सकता है, श्रीकृष्ण के अनुसार, जो कार्य `यज्ञ’ सार्वजनिक कल्याण के लिए नहीं किया जाता, वह समाज को बंधन और दरिद्रता में डालता है। यदि देश की संपत्ति केवल कुछ लोगों तक सीमित है, तो प्रजा का `अनुराग’ प्रेम राजा को नहीं मिल सकता।

विक्रम-बेताल और `गीता’ ज्ञान
`महाभारत में भी श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान दिया था, अर्जुन जैसे ज्ञानी पुरुष ने उसका उपभोग किया, वहीं दुर्योधन जैसे अहंकारी राजा ने एक सुई की जगह तक देने से इनकार कर दिया और विदुर जैसे नीति मर्मज्ञ की बातों को हवा में उड़ा दिया। गीता गोपीनाथ ने भी सच का आईना दिखाने की कोशिश की थी, उस वक्त उन्हें अनदेखा कर दिया गया! यह अच्छी बात है कि आरबीआई के मुखिया ने गीता से मुलाकात की है, लेकिन मुलाकात करना और ज्ञान का उपभोग करना दो अलग-अलग बातें हैं।’ `कर्मण्येवाधिकारस्ते… राजन फल की चिंता किए बिना तूने फिर कर्म किया, मुंह खोल दिया, बोल दिया विक्रम! अब मैं चला!’ बेताल खिलखिलाते हुए कंधे से चला और वापस उड़ गया।

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