सामना संवाददाता / अयोध्या
राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में अब एक और चौंकाने वाला मोड़ सामने आया है। अब तक जांच का फोकस मंदिर की हुंडियों और गणना कक्ष से नोटों की गड्डियां पार करने पर था, लेकिन पूछताछ में आरोपियों ने कथित रूप से यह भी कबूल किया है कि भक्तों को फर्जी दान रसीदों के जरिए भी ठगा गया। यानी खेल केवल चढ़ावे की गिनती में नहीं, बल्कि दान देने वाले श्रद्धालुओं के भरोसे पर भी खेला गया।
असली-नकली की पहचान मुश्किल
रिपोर्टों के अनुसार, जांच के दौरान फर्जी रसीद बुक बरामद हुई हैं। ये रसीदें इतनी सफाई से तैयार की गई थीं कि वे असली रसीदों जैसी दिखती थीं। उन पर मंदिर ट्रस्ट जैसा लोगो भी छपा था, जिससे सामान्य श्रद्धालु के लिए यह पहचानना मुश्किल हो जाता था कि दान की रसीद असली है या नकली।
आस्था से खिलवाड़
भक्तों की श्रद्धा और आस्था का फायदा उठाकर दान लिया गया और रकम को अधिकृत खाते या व्यवस्था तक पहुंचाने के बजाय हड़प लिया गया। यह पहलू इसलिए बेहद गंभीर है, क्योंकि राम मंदिर में चढ़ाया गया पैसा केवल नकदी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है।
ट्रस्ट से जुड़े लोगों ने की थी सिफारिश
भक्त यह मानकर दान देते हैं कि उनकी राशि मंदिर सेवा, धार्मिक व्यवस्था और सार्वजनिक हित में लगेगी। एसआईटी की जांच में पहले ही यह बात सामने आ चुकी है कि दान गणना व्यवस्था में नियुक्त कई आरोपी ट्रस्ट से जुड़े लोगों की सिफारिश पर संवेदनशील भूमिकाओं में रखे गए थे। इसी से नियुक्ति, निगरानी और जवाबदेही पर सवाल और गहरे हो गए हैं।
किसने छपवाईं फर्जी रसीदें?
इससे पहले जांच में करीब ७७ लाख रुपए की नकदी ट्रेल सामने आने और आरोपियों से बरामदगी की जानकारी भी सामने आई थी। एक आरोपी अविनाश शुक्ला के पास से सबसे ज्यादा रिकवरी बताई गई थी। वहीं, जांच के बीच ट्रस्ट में बड़ा फेरबदल भी हुआ है। चंपत राय और अनिल मिश्रा के इस्तीफे स्वीकार किए गए और नेतृत्व में बदलाव की प्रक्रिया शुरू की गई। अब सवाल केवल इतना नहीं है कि हुंडी से कितनी रकम गायब हुई। सवाल यह भी है कि फर्जी रसीदें किसने छपवार्इं, इन्हें कितने समय तक इस्तेमाल किया गया, कितने भक्तों से पैसा लिया गया, रकम किसके पास गई और क्या इसमें कोई संगठित नेटवर्क शामिल था? एसआईटी ने साफ किया है कि जांच अभी जारी है। अंतिम रिपोर्ट में पर्यवेक्षणीय विफलताओं, प्रशासनिक जवाबदेही, संस्थागत खामियों और सुधारात्मक उपायों पर विस्तृत निष्कर्ष सामने आने हैं। लेकिन फर्जी दान रसीदों का यह खुलासा बताता है कि यह मामला केवल चढ़ावा चोरी नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं के विश्वास की सुनियोजित लूट भी हो सकता है।
