अनिल तिवारी
मुंबई
उत्तरार्ध
पूर्वार्ध आलेख का मुख्य सुझाव था कि एमएमआर में निजी बसों के अनियंत्रित संचालन से ट्रैफिक जाम, ईंधन की बर्बादी, प्रदूषण, दुर्घटना-जोखिम और यात्रियों की असुविधा बढ़ रही है। यदि संयुक्त बस अड्डे से निजी बसें संचालित होती हैं, तो इससे सभी को काफी लाभ होगा। एक मॉडल के तहत तमाम सार्वजनिक परिवहन उपक्रमों के खाली या कम उपयोग वाले डिपो/बस-स्टैंड निजी बसों को नियंत्रित शुल्क पर उपलब्ध कराकर इससे निजी बसों को सड़क किनारे खड़े होने से रोका जा सकेगा और यात्रियों को सुरक्षित प्रतीक्षालय, शौचालय, टिकटिंग सहायता और व्यवस्थित पिकअप-ड्रॉप जैसी सुविधाएं मिल सकेंगी। उस पर इस व्यवस्था से सरकार को प्लेटफॉर्म शुल्क, पार्किंग शुल्क, विज्ञापन और वाणिज्यिक उपयोग के जरिए बड़ा राजस्व मिल सकता है। साथ ही ट्रैफिक जाम घटेगा, मानवीय घंटे बचेंगे, ईंधन की बर्बादी कम होगी और प्रदूषण में कमी आएगी। अनुमान के अनुसार, ऐसी व्यवस्था लागू होने पर सालाना करोड़ों रुपये की ईंधन-बचत और हजारों टन कार्बन उत्सर्जन में भी कमी संभव है। हालांकि, यहां सवाल यह है कि क्या ऐसा मॉडल कहीं और भी है?
यह कोई असंभव विचार नहीं है। कई राज्यों में रोडवेज और निजी बसें संयुक्त बस अड्डे या निर्धारित परिसर से संचालित होती हैं? तो जवाब है, हां, कुछ स्तर तक, कुछ राज्यों में यह व्यवस्था है।
कर्नाटक में २०२१ में परिवहन विभाग ने निजी ऑपरेटरों को केएसआरटीसी, बीएमटीसी और अन्य राज्य परिवहन इकाइयों के बस स्टैंड-स्टेशनों से यात्रियों को लेने-छोड़ने और पार्किंग की अनुमति दी थी। राजस्थान में ‘आपणी बस’ सेवा राजस्व-साझेदारी मॉडल पर शुरू की गई, जिसमें निजी ऑपरेटरों के साथ मिलकर आरएसआरटीसी बस स्टैंड से सेवा संचालन का मॉडल अपनाया गया। उत्तर भारत के कुछ राज्यों में आंशिक स्तर पर ऐसा होता है। खुद महाराष्ट्र में भी नासिक जैसे शहरों में निजी लक्जरी बसों की अनियंत्रित आवाजाही रोकने के लिए समय-प्रतिबंध और निर्धारित टर्मिनल उपयोग जैसी व्यवस्था लागू की गई, निजी बसों को कुछ व्यस्त क्षेत्रों में पिकअप-ड्रॉप से रोका गया और उन्हें निर्धारित टर्मिनल का उपयोग करने को कहा गया। नागपुर में भी निजी बसों के पिकअप-ड्रॉप पॉइंट, ट्रैफिक प्रतिबंध और वैकल्पिक जगहों को लेकर बहस हुई, जहां ३५०-४०० बसों और २,५००-३,००० यात्रियों की दैनिक आवाजाही का उल्लेख सामने आया। यह दिखाता है कि समस्या केवल मुंबई की नहीं है, लेकिन मुंबई में इसका पैमाना बहुत बड़ा है। कमोवेश यह समस्या पूरे देश की है। लिहाजा यह मॉडल देश के अन्य राज्यों को भी अपनाना चाहिए।
सरकार की संभावित आपत्तियां
सरकार की कुछ संभावित आपत्तियां हो सकती हैं कि डिपो सार्वजनिक बसों के लिए हैं, निजी बसों के लिए नहीं? यह सच भी है कि डिपो का प्राथमिक उपयोग सार्वजनिक बसों के लिए ही रहना चाहिए। लेकिन खाली समय, रात के स्लॉट, बाहरी परिधि, अलग प्रवेश-निकास और निर्धारित प्लेटफॉर्म निजी इंटरसिटी बसों के लिए शुल्क पर दिए जा सकते हैं। यह सार्वजनिक संपत्ति का बेहतर उपयोग होगा, न कि उसका निजीकरण।
बात डिपो में जगह नहीं होने की भी हो सकती है तो पूरे एमएमआर में सभी बसों को एक ही डिपो में नहीं लाना है। क्षेत्रवार टर्मिनल नेटवर्क बनाना है। बोरीवली-दहिसर, सायन-चेंबूर, ठाणे-माजीवाड़ा, वाशी-बेलापुर, खारघर-कलंबोली, पनवेल, कल्याण और वसई-विरार जैसे अलग-अलग नोड बनाए जा सकते हैं। इससे दबाव बंटेगा तो ट्रैफिक का जाम भी घटेगा।
एक आपत्ति शायद यह भी हो कि निजी ऑपरेटर विरोध करेंगे। ऑपरेटर तभी विरोध करेंगे जब नियम अचानक और बिना सुविधा के लागू होंगे। यदि उन्हें डिजिटल स्लॉट, यात्री सुविधा, सुरक्षित पार्किंग, तय शुल्क, ऑनलाइन परमिट और स्पष्ट प्रवर्तन मिलेगा तो वे भी सड़क पर खड़े रहने के जोखिम से बचेंगे। अवैध पिकअप पर भारी जुर्माना और टर्मिनल उपयोग पर वैध सुविधा, यह दोहरी नीति कारगर हो सकती है।
तर्क यह भी आ सकता है कि यात्रियों को दूर जाना पड़ेगा। आज भी यात्रियों को सड़क किनारे असुरक्षित और अनिश्चित पिकअप पॉइंट पर जाना पड़ता है। यदि टर्मिनल मेट्रो, लोकल स्टेशन, बेस्ट/एनएमएमटी/टीएमटी बस सेवा, ऑटो-टैक्सी स्टैंड और पार्किंग से जुड़े हों तो यात्री सुविधा घटेगी नहीं, बढ़ेगी। छोटे फीडर पिकअप वाहन या मिनीबस सेवा भी चलाई जा सकती है।
लागू करने का व्यावहारिक रोडमैप
पहला चरण: एमएमआरडीए, परिवहन विभाग, ट्रैफिक पुलिस, बीएमसी, बेस्ट, एनएमएमटी, टीएमटी, केडीएमटी, एमबीएमटी, वीवीएमटी और एमएमआरटीसी मिलकर एमएमआर में निजी बसों का वास्तविक सर्वे करें। हर ऑपरेटर, रूट, पिकअप पॉइंट, बस संख्या, समय और पार्विंâग पैटर्न का डिजिटल पंजीकरण हो।
दूसरा चरण: ८ से १२ पायलट टर्मिनल चुने जाएं—जैसे बोरीवली / दहिसर, सायन / चेंबूर, ठाणे-माजीवाड़ा, वाशी / बेलापुर, कलंबोली / पनवेल, कल्याण, वसई-विरार और भिवंडी।
तीसरा चरण: हर बस को डिजिटल स्लॉट दिया जाए। बिना स्लॉट सड़क पर प्िाकअप या पार्विंâग पर भारी चालान हो। मुंबई ट्रैफिक पुलिस ने हाल में बस स्टॉप पर अवैध पार्किंग के खिलाफ विशेष अभियान में २६,००० से अधिक चालान जारी किए थे, जिससे स्पष्ट है कि प्रवर्तन संभव है।
चौथा चरण: टर्मिनलों पर यात्री सुविधाएं अनिवार्य हों, शौचालय, प्रतीक्षालय, सीसीटीवी, महिला सुरक्षा डेस्क, पुलिस बूथ, डिजिटल डिस्प्ले, पीने का पानी, सामान क्षेत्र, फूड काउंटर और ऑनलाइन टिकट सत्यापन।
पांचवां चरण: राजस्व मॉडल स्पष्ट हो, बस प्रवेश शुल्क, प्लेटफॉर्म शुल्क, रात की पार्किंग, विज्ञापन, वाणिज्यिक स्टॉल, डिजिटल टिकटिंग शुल्क और प्रीमियम स्लॉट शुल्क। यह आय संबंधित परिवहन उपक्रमों की वित्तीय स्थिति सुधारने में लगाई जाए।
निष्कर्ष: मुंबई को सड़क किनारे बस-राज से मुक्त करना होगा।
मुंबई महानगरीय क्षेत्र में निजी बसें यात्रियों की वास्तविक जरूरत पूरी करती हैं। इन्हें बंद करना न व्यावहारिक है, न उचित। लेकिन इन्हें सड़क पर अराजक रूप से खड़े रहने देना भी जनता के साथ अन्याय है। यह व्यवस्था न यात्रियों के हित में है, न शहर के, न पर्यावरण के और न ही सरकार के राजस्व के।
जब एमएमआर में बेस्ट, एनएमएमटी, टीएमटी, केडीएमटी, एमबीएमटी, वीवीएमटी और एसटी, एमएसआरटीसी जैसी सार्वजनिक परिवहन संस्थाओं के पास डिपो और बस-स्थान उपलब्ध हैं, तब निजी बसों को नियंत्रित शुल्क के साथ इन्हीं परिसरों से संचालित करना समय की मांग है। इससे यात्रियों को सुविधा मिलेगी, सरकार को राजस्व मिलेगा, सड़कें खाली होंगी, प्रदूषण घटेगा और निजी बस व्यवसाय भी अधिक पारदर्शी बनेगा।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जब सड़क पर अव्यवस्था से नुकसान ही नुकसान है और डिपो-आधारित व्यवस्था से राजस्व, सुविधा और अनुशासन तीनों मिल सकते हैं, तो मुंबई महानगरीय क्षेत्र में इसे लागू करने में सरकार को आपत्ति आखिर क्यों होनी चाहिए?
प्रदूषण, मानवीय घंटों और ईंधन की बचत
यदि मुंबई महानगरीय क्षेत्र में निजी बसों को सड़क किनारे खड़ा करने के बजाय निर्धारित बस डिपो/टर्मिनल से संचालित किया जाए, तो इसका आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ काफी बड़ा हो सकता है। एक व्यावहारिक अनुमान के अनुसार, यदि रोजाना लगभग ४,००० से ४,५०० निजी बस मूवमेंट के कारण औसतन ५ से १० मिनट का अतिरिक्त ट्रैफिक अवरोध पैदा होता है और हर अवरोध से आसपास के वाहनों में कुल मिलाकर १०० से २०० मानवीय मिनट नष्ट होते हैं, तो प्रतिदिन करीब ५,००० से १५,००० मानवीय घंटे बचाए जा सकते हैं। सालाना यह बचत लगभग १८ से ५५ लाख मानवीय घंटे तक पहुंच सकती है। इसी तरह, जाम में फंसे वाहनों और अनावश्यक इंजन-आइडलिंग से यदि प्रति बस मूवमेंट औसतन ३ से ७ लीटर ईंधन की अप्रत्यक्ष बर्बादी मानी जाए, तो रोजाना लगभग ३०,००० से ३५,५०० लीटर ईंधन बच सकता है। डीजल/पेट्रोल का औसत मूल्य ९५ से १०० रुपये प्रति लीटर मानें तो यह प्रतिदिन लगभग ३० लाख से ३१ लाख रुपये और सालाना करीब १०० करोड़ से ११५ करोड़ रुपये की ईंधन-बचत हो सकती है। डीजल के प्रत्येक लीटर जलने पर लगभग २.६८ किलोग्राम कार्बन उत्सर्जन होता है; इस आधार पर सालाना लगभग ३०,००० से ३२,००० टन कार्बन उत्सर्जन घटाया जा सकता है। इसके अलावा पार्टिकुलेट मैटर, नाइट्रोजन ऑक्साइड, हॉर्न-शोर और स्थानीय वायु प्रदूषण में भी उल्लेखनीय कमी आएगी। यानी यह केवल ट्रैफिक प्रबंधन का उपाय नहीं, बल्कि ईंधन-बचत, प्रदूषण नियंत्रण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शहरी उत्पादकता से जुड़ा बड़ा आर्थिक सुधार सिद्ध हो सकता है।
यदि उन्हें डिजिटल स्लॉट, यात्री सुविधा, सुरक्षित पार्किंग, तय शुल्क, ऑनलाइन परमिट और स्पष्ट प्रवर्तन मिलेगा तो वे भी सड़क पर खड़े रहने के जोखिम से बचेंगे। अवैध पिकअप पर भारी जुर्माना और टर्मिनल उपयोग पर वैध सुविधा, यह दोहरी नीति कारगर हो सकती है।
