मुख्यपृष्ठस्तंभविजय-विमर्श : बीजेपी में गए ‘आप’ सांसद, अयोग्य होंगे या बच जाएंगे?

विजय-विमर्श : बीजेपी में गए ‘आप’ सांसद, अयोग्य होंगे या बच जाएंगे?

विजयशंकर चतुर्वेदी
आम आदमी पार्टी के राघव चड्ढा समेत सात राज्यसभा सांसदों का भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है, यह भारतीय लोकतंत्र की संवैधानिक आत्मा की परीक्षा है। ये सभी सांसद आप के टिकट पर राज्यसभा पहुंचे थे। ऐसे में उनका यह कदम सीधे तौर पर संविधान की दसवीं अनुसूची, यानी दल-बदल विरोधी कानून के मूल उद्देश्य को चुनौती देता है। सवाल अब यह नहीं रह गया है कि ये सांसद अयोग्य होंगे या नहीं; असली सवाल यह है कि क्या कानून अपनी आत्मा के अनुरूप लागू होगा या फिर एक बार फिर उसकी व्याख्या राजनीतिक सुविधा के अनुसार ढाली जाएगी?
दल-बदल कानून का उद्देश्य और वर्तमान विडंबना
दल-बदल विरोधी कानून १९८५ में इसलिए लाया गया था कि लोकतंत्र को ‘आयाराम, गयाराम’ की संस्कृति से बचाया जा सके। यह केवल कानूनी प्रावधान नहीं था, बल्कि राजनीतिक नैतिकता को संरक्षित करने का प्रयास था। लेकिन विडंबना यह है कि जिस कानून का उद्देश्य दल-बदल को रोकना था, वही आज कई बार दल-बदल को वैध ठहराने का उपकरण बनता दिखता है। इस मामले में भी यही आशंका उभर रही है। पूरे विवाद का केंद्र है दसवीं अनुसूची का पैरा ४-जिसमें ‘विलय’ का प्रावधान है। यदि किसी दल का विधायी दल दो-तिहाई बहुमत के साथ किसी अन्य दल में विलय करता है तो अयोग्यता से छूट मिल सकती है। आप के राज्यसभा में १० में से ७ सांसदों का जाना इस गणित को पूरा करता हुआ दिखता है, लेकिन क्या केवल संख्या ही पर्याप्त है? क्या ‘विलय’ का अर्थ केवल विधायकों का एक समूह लेकर दूसरी पार्टी में चले जाना है? यहीं कानून और उसकी आत्मा के बीच का अंतर सामने आता है। ‘विलय’ शब्द अपने आप में एक गहरी राजनीतिक और संगठनात्मक प्रक्रिया को दर्शाता है, जहां केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरा राजनीतिक ढांचा, उसकी विचारधारा, संगठनात्मक संरचना और पहचान दूसरे दल में समाहित होती है। अगर केवल सांसदों का समूह दूसरी पार्टी में शामिल हो जाए तो उसे ‘विलय’ कहना कानून की भाषा और भावना-दोनों के साथ छल होगा। यह दरअसल दल-बदल को एक तकनीकी रास्ता देने जैसा होगा।
कानून की भाषा,
संशोधन और न्यायिक दृष्टि
कानून की भाषा भी इस बात को स्पष्ट करती है। पैरा ४ में ‘यदि और सिर्फ यदि’ जैसे शब्द यूं ही नहीं जोड़े गए हैं। उनका अर्थ है कि पहले वास्तविक विलय होना चाहिए और उसके बाद दो-तिहाई सदस्यों की सहमति। लेकिन आज जो व्याख्याएं सामने आती हैं, उनमें इस क्रम को उलट दिया जाता है-पहले संख्या जुटाई जाती है, फिर उसे ‘विलय’ का नाम दे दिया जाता है। यह कानून की आत्मा को उलट देने जैसा है।
यह याद रखना जरूरी है कि २००३ में ९१वें संविधान संशोधन के जरिए ‘स्प्लिट’ (एक-तिहाई के अलग होने) का प्रावधान इसलिए हटाया गया था, क्योंकि उसका खुलेआम दुरुपयोग हो रहा था। उस समय भी तर्क यही था कि संख्या के खेल से लोकतंत्र को बचाना होगा। लेकिन आज ‘विलय’ के नाम पर वही खेल नए रूप में लौटता हुआ दिख रहा है। फर्क केवल इतना है कि अब संख्या का पैमाना बदल गया है।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई बार यह स्पष्ट किया है कि दल-बदल के मामलों में केवल गणित पर्याप्त नहीं है। किहोटो होलोहन बनाम जाचिल्लू में अदालत ने कानून को वैध ठहराते हुए यह भी कहा था कि सभापति का निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में आएगा, यानी अंतिम शब्द केवल राजनीतिक पदाधिकारी का नहीं होगा।
वहीं राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य में अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे मामलों में ‘वास्तविकता’ और ‘परिस्थितियों’ को देखा जाना चाहिए, न कि केवल संख्या को। लेकिन व्यवहार में अक्सर यही देखा गया है कि संख्या ही निर्णायक बन जाती है।
राजनीतिक उदाहरण और समय का कारक
महाराष्ट्र में शिवसेना का मामला इस प्रवृत्ति का सबसे ताजा उदाहरण है। वहां भी बड़ी संख्या में विधायकों ने मूल दल से अलग होकर नई राजनीतिक संरचना बनाई और अंतत: उसे मान्यता भी मिल गई। लेकिन उस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल छोड़ा कि क्या अब कानून की व्याख्या राजनीतिक शक्ति-संतुलन के अनुसार तय होगी? अगर हां, तो फिर कानून और नैतिकता के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जाएगी।
इस पूरे विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू है-समय। दल-बदल के मामलों में निर्णय अक्सर इतनी देर से आते हैं कि उनका राजनीतिक प्रभाव पहले ही पड़ चुका होता है। संबंधित सांसद तब तक सदन में भाग लेते रहते हैं, सरकारों के गठन और गिरने में भूमिका निभाते हैं और कानून के अंतिम निर्णय का महत्व घट जाता है। ऐसे में न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि समय पर होना भी उतना ही जरूरी है।
नैतिकता और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता
वर्तमान मामले में भी यही स्थिति है। जब तक राज्यसभा के सभापति कोई अंतिम निर्णय नहीं लेते, तब तक ये सांसद अपनी सदस्यता बनाए रखेंगे और सक्रिय भूमिका निभाते रहेंगे। अगर अंतत: इसे ‘विलय’ मान लिया जाता है, तो यह एक खतरनाक मिसाल बन सकती है, जहां संख्या के आधार पर दल-बदल को वैधता मिल जाएगी और अगर इसे ‘दल-बदल’ मानकर अयोग्यता घोषित की जाती है तो यह कानून की मूल भावना की पुन: पुष्टि होगी।
असल प्रश्न अब यह नहीं है कि सात सांसदों का क्या होगा। असली सवाल यह है कि क्या भारत का दल-बदल विरोधी कानून अपने मूल उद्देश्य-राजनीतिक स्थिरता और जनादेश की रक्षा-को निभा पा रहा है या फिर वह राजनीतिक पुनर्संरचना का एक सुविधाजनक औजार बनता जा रहा है?
कानून जीतेगा या राजनीति?
लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं है; वह विश्वास का तंत्र है। जब मतदाता किसी दल को वोट देता है तो वह केवल व्यक्ति को नहीं, बल्कि एक विचार और वचनबद्धता को चुनता है। यदि निर्वाचित प्रतिनिधि उस विश्वास को तकनीकी व्याख्याओं के सहारे बदल सकते हैं तो यह लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर करता है।
इसलिए इस मामले का पैâसला केवल कानूनी नहीं होगा; यह एक नैतिक संकेत भी देगा। यह तय करेगा कि भारत में कानून राजनीति को नियंत्रित करता है या राजनीति कानून को अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ लेती है। अगर दूसरा सच हुआ तो यह केवल एक केस की हार नहीं होगी-यह लोकतांत्रिक विश्वसनीयता की एक और परत के क्षरण का संकेत होगा।
(विजयशंकर चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार-लेखक हैं, जनसत्ता से लंबे समय तक जुड़े रहे, आजकल पर्यावरण, सामाजिक मुद्दों और भू-राजनीतिक विषय्झाों पर नियमित लेखन।)

(विजयशंकर चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार-लेखक हैं, जनसत्ता से लंबे समय तक जुड़े रहे, आजकल पर्यावरण, सामाजिक मुद्दों और भू-राजनीतिक विषय्झाों पर नियमित लेखन।)

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