एम एम एस
सरकार का नया खाद्य सुरक्षा और मानक संशोधन नियम २०२६ देखकर तो वही कहावत याद आती है कि तन पर नहीं लत्ता और पान खाए अलबत्ता। सिस्टम को इस बात की चिंता कम है कि आदमी के अंदर क्या जा रहा है बल्कि फिक्र बस इस बात की है कि वह बाहर क्या फेक रहा है। प्रस्ताव है कि अब कैंसर का यह सामान प्लास्टिक के बजाय कागज या कांच की बोतलों में सजेगा। यानी अब मौत भी इको-प्रâेंडली और सस्टेनेबल होगी। वाह भाई वाह इसे कहते हैं घर में आग लगी हो और बाहर की नाली साफ करना।
सरकार का तर्क है कि प्लास्टिक के छोटे पाउच नालियां जाम करते हैं। यह सच है पर उस जाम का क्या जो इन उत्पादों को चबाने वालों की धमनियों और गले में लग रहा है? प्लास्टिक पर बैन लगाकर सरकार ने यह तो तय कर दिया कि धरती माता चैन की सांस ले सकें, लेकिन उन बेटों का क्या जिनके फेफड़े तंबाकू के बोझ तले दबे जा रहे हैं? यह तो वही बात हुई कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। यानी पर्यावरण का प्रदूषण भी रुक जाए और खजाने में आने वाली लाल कमाई पर भी आंच न आए।
मजे की बात देखिए कि सरकार पाउच बदल रही है पर उत्पाद नहीं। यह तो मुंह में राम बगल में छुरी जैसा हाल है। एक तरफ पर्यावरण बचाने का पवित्र संदेश है और दूसरी तरफ तंबाकू से मिलने वाले मोटे राजस्व का मोह। इसे कहते हैं कि जहर को सोने की कटोरी में परोसकर उसे सेहतमंद घोषित करना। सरकार की इस नीति पर ऊपर से फिटफाट और अंदर से मोकामघाट वाली कहावत एकदम सटीक बैठती है।
विडंबना यह है कि हम डिजिटल इंडिया की बात करते हैं पर एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जिसकी पहचान लाल पिचकारी बन गई है। अगर सरकार वास्तव में गंभीर है तो उसे सिर्फ कवर नहीं बल्कि कंटेंट पर वार करना होगा। वरना केवल डिब्बे बदलना तो अपनी पीठ आप थपथपाने जैसा ही है। अब जब आप कांच की सुंदर बोतल से तंबाकू निकालेंगे तो गर्व महसूस कर सकते हैं कि आप भले ही खुद को खत्म कर रहे हों पर कम से कम देश को कचरा मुक्त रख रहे हैं। सस्टेनेबल सुसाइड का इससे बेहतरीन उदाहरण भला और क्या होगा?
