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प. बंगाल चुनाव विशेष : चुनाव और ‘फलता’ भेदभाव

अनिल तिवारी

पश्चिम बंगाल के फलता क्षेत्र में चुनाव आयोग के पुलिस ऑब्जर्वर अजय पाल शर्मा और तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार जहांगीर खान के बीच टकराव केवल एक स्थानीय चुनावी विवाद नहीं है; यह उस गहरी चिंता का संकेत है, जो पिछले कुछ वर्षों से चुनाव आयोग की निष्पक्षता, अधिकारियों की भूमिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को लेकर लगातार बढ़ती जा रही है।
विश्वास का संकट और चुनावी आचरण
टीएमसी और समाजवादी पार्टी ने चुनाव आयोग के ऑब्जर्वर पर राजनीतिक पक्षधरता के आरोप लगाए। मंगलवार को फलता में अजय पाल शर्मा का काफिला जब टीएमसी कार्यालय के सामने से गुजरा, तब कथित रूप से टीएमसी कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी की और माहौल तनावपूर्ण हो गया। इस विवाद ने ‘सिंघम बनाम पुष्पा’ जैसी राजनीतिक भाषा को जन्म दिया, जिसमें एक ओर अधिकारी की ‘दबंग’ छवि उभारी गई, तो दूसरी ओर स्थानीय उम्मीदवार ने भी आक्रामक जवाबी भाषा अपनाई। मामला कलकत्ता हाई कोर्ट तक पहुंचा, लेकिन अदालत ने मतदान से ठीक पहले चुनाव ड्यूटी पर लगे अधिकारियों के संबंध में तत्काल दखल देने से इनकार किया। यहां मूल प्रश्न यह नहीं है कि अजय पाल शर्मा सख्त अधिकारी हैं या नहीं। मूल प्रश्न यह है कि क्या चुनावी प्रक्रिया में नियुक्त किसी भी अधिकारी का आचरण ऐसा होना चाहिए, जिससे वह किसी दल, उम्मीदवार या सत्ता-प्रतिस्पर्धा का सक्रिय पात्र दिखाई देने लगे? चुनाव आयोग के अधिकारी का पहला धर्म निष्पक्षता ही नहीं, बल्कि निष्पक्ष दिखाई देना भी है। लोकतंत्र में विश्वास केवल कानून की किताबों से नहीं चलता; वह सार्वजनिक आचरण, भाषा और संस्थागत मर्यादा से भी बनता है। अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि भाजपा ने पश्चिम बंगाल में ऑब्जर्वर के नाम पर अपने ‘एजेंट’ भेजे हैं। उन्होंने रामपुर और संभल जैसे उत्तर प्रदेश के संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे अधिकारी लोकतंत्र के अपराधी हैं और भविष्य में उनके कार्यों की जांच होनी चाहिए। यह बयान केवल बंगाल चुनाव पर टिप्पणी नहीं है। यह विपक्षी दलों की उस व्यापक धारणा को दर्शाता है, जिसमें वे चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार संदेह जता रहे हैं। समस्या यहीं से शुरू होती है। जब सख्ती भी पक्षधरता जैसी दिखने लगे और निष्पक्षता भी राजनीतिक चश्मे से देखी जाने लगे, तब लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था, चुनाव प्रक्रिया विश्वास के संकट में घिर जाती है।
पिछले वर्षों में उठे प्रमुख सवाल
पिछले १०-१२ वर्षों में चुनाव आयोग को लेकर कई ऐसे विवाद सामने आए हैं, जिनसे उसकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर राजनीतिक बहस तेज हुई। लोकसभा चुनाव २०१९ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह से जुड़े कई भाषणों व चुनावी आचरण पर विपक्ष ने शिकायतें की थीं। तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने आयोग द्वारा दी गई कुछ क्लीन चिट्स पर असहमति दर्ज की थी। इसी चुनाव में मतदान के अंतिम चरण के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की केदारनाथ यात्रा के व्यापक मीडिया कवरेज पर टीएमसी और कांग्रेस ने चुनाव आयोग से शिकायत की थी। मार्च २०२३ में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चुनाव आयोग को कार्यपालिका के नियंत्रण से स्वतंत्र रखना आवश्यक है और तब तक के लिए नियुक्त समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने की व्यवस्था दी थी, जब तक संसद कानून न बना दे। बाद में २०२३ के कानून में मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से बाहर कर दिया गया। २०२४ के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले चुनाव आयुक्त अरुण गोयल के अचानक इस्तीफे ने भी बड़े सवाल खड़े किए। इसी चुनाव में चरणवार मतदान प्रतिशत और अंतिम आंकड़ों की घोषणा में देरी को लेकर विपक्ष और नागरिक समूहों ने सवाल उठाए।
हालिया घटनाक्रम में विपक्षी सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए राज्यसभा में नोटिस दिया। विपक्ष ने उन पर मॉडल कोड लागू करने में पक्षपात और संवैधानिक पद की गरिमा से जुड़े आरोप लगाए हैं। ये आरोप सिद्ध होना अलग बात है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि चुनाव आयोग पर अविश्वास अब केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संसदीय प्रक्रिया तक पहुंच चुका है। जब विपक्ष बार-बार कहे कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है, जब आयोग विपक्ष की शिकायतों पर अपेक्षित संवाद न करे, जब नियुक्तियों पर कार्यपालिका के प्रभाव का आरोप लगे और मॉडल कोड के पालन में दोहरे मापदंड का संदेह पैदा हो, तब चुनाव परिणाम चाहे जो भी हों, जनता के मन में शंका बैठने लगती है। यही शंका लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती है।
चुनाव आयोग की सबसे बड़ी पूंजी उसकी वैधानिक शक्ति नहीं, बल्कि नैतिक विश्वसनीयता है। पुलिस, प्रशासन, केंद्रीय बल, ईवीएम, वीवीपैट, ऑब्जर्वर और रिटर्निंग ऑफिसर, ये सब व्यवस्था के उपकरण हैं; लेकिन इन पर जनता का भरोसा तभी बना रहता है, जब आयोग स्वयं निष्पक्ष, संयमित और पारदर्शी दिखाई दे। लोकतंत्र की रक्षा केवल मतदान से नहीं होती; वह निष्पक्षता की अनुभूति से होती है। यदि चुनाव आयोग पर जनता का भरोसा डगमगाया, तो चुनाव जीतने वाला भी नैतिक रूप से पराजित दिखाई देगा और हारने वाला भी व्यवस्था से विमुख होगा। इसलिए बंगाल का यह विवाद चेतावनी है, चुनाव आयोग को आयोग की तरह दिखना होगा, किसी सत्ता, दल या अधिकारी की छवि की तरह नहीं।

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