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संपादकीय : इच्छाशक्ति का चीरहरण!

राज्य सरकार के पास इच्छाशक्ति का अभाव है, इन शब्दों में मुंबई उच्च न्यायालय ने सत्ताधारियों के कान मरोड़े हैं। आपको अपने ही कानून और अधिकार नहीं पता, इस पर आपको शर्म आनी चाहिए, ऐसा कहते हुए सरकार की इज्जत का जनाजा निकाला। मुंबई में अनधिकृत फेरीवालों के अतिक्रमण पर की जाने वाली कार्रवाई को लेकर न्यायालय ने यह खरी-खोटी सुनाई। केवल मुंबई में ही नहीं, बल्कि राज्य के सभी छोटे-बड़े शहरों में अनधिकृत फेरीवाले, उनके द्वारा किए गए अतिक्रमण, उनसे नागरिकों को होने वाली परेशानी और उस पर राजनेताओं व प्रशासन की होने वाली अनदेखी, यह प्रश्न गंभीर बन गया है। जिन्हें अनधिकृत फेरीवालों को हटाना चाहिए और पैदल चलने वालों को खुली सांस लेने देना चाहिए, वे ही हाथ पर हाथ धरे और मुंह पर उंगली रखकर चुप बैठे हैं। वास्तव में, अनधिकृत फेरीवालों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कानून हैं। उनके अनुसार सरकार के पास अधिकार हैं; परंतु उनका उपयोग नहीं किया जाता। बीच-बीच में
दिखावे की कार्रवाई
की जाती है; परंतु उसके बाद हालात `फिर वही ढाक के तीन पात’ हो जाता है। कारण यह है कि यदि कानूनी अधिकारों का उपयोग किया गया और अनधिकृत फेरीवालों को हटाया गया, तो सत्ताधारियों के `हितों’ को धक्का लगेगा। उनकी `सांठ-गांठ’ खतरे में आ जाएगी। इसीलिए न्यायालय द्वारा कई बार कान उमेंठने के बावजूद फेरीवालों के प्रश्न पर सरकार की `चुप्पी’ बरकरार है। `हम मजबूर हैं,’ ऐसा निर्लज्जता से उच्च न्यायालय में कहने में भी इन लोगों को कुछ महसूस नहीं होता। सरकार, महानगरपालिका और पुलिस के बीच यह टालमटोल जारी रहती है। अनधिकृत फेरीवालों के प्रश्न की जड़ में यह भ्रष्ट त्रिकोण है। इसीलिए उच्च न्यायालय द्वारा सरकार को फटकार लगाने के बावजूद, अधिकृत फेरीवालों के लिए `वेंडिंग कमेटी’ स्थापित करने हेतु सात महीने और बाद में कार्यान्वयन के लिए एक महीना लगेगा, ऐसा सरकार की ओर से न्यायालय में
ढिठाई से
कहा गया। इस संदर्भ में अधिसूचना निकालने का भी दावा किया। बेशक, यह दावा और सरकार का कार्रवाई का वादा, इन दोनों बातों को न्यायालय ने `महज धूल झोंकना’ कहकर खारिज कर दिया। मुंबई के तीन लाख से अधिक अनधिकृत फेरीवालों में से यदि अब तक केवल नौ हजार फेरीवालों के खिलाफ ही कार्रवाई हुई हो, तो न्यायालय को यह धूल झोंकना नहीं तो और क्या लगेगा? महाराष्ट्र सरकार केवल अवैध फेरीवालों के मामले में ही सुस्त है ऐसा नहीं है, आम जनता के अन्य प्रश्नों के संदर्भ में भी स्थिति अलग नहीं है। अनधिकृत फेरीवालों के बहाने ही सही, उच्च न्यायालय ने सत्ताधारियों की इज्जत निकाली और उनकी राजनीतिक इच्छाशक्ति का चीरहरण किया, यह अच्छा ही हुआ। बेशक, सत्ता और उस सत्ता से फिर पैसा, यही जिनकी राजनीतिक इच्छाशक्ति बन गई है और जिनकी इच्छा व शक्ति केवल राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ ही जागृत होती है, क्या उन्हें न्यायालय द्वारा किए गए चीरहरण से शर्म आएगी? यह एक प्रश्न ही है।

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