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बेबाक : मीरा रोड से नासिक तक, कट्टरता का क्रूर होता चेहरा

अनिल तिवारी
मुंबई

मुंबई से सटे मीरा रोड में दो सुरक्षा गार्डों पर जेहादी हमला केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़ी होती एक गंभीर चेतावनी भी है। पहले एक व्यक्ति ने गार्ड्स से उनका नाम और धर्म पूछा, फिर उन्हें कलमा पढ़ने को कहा। जब वे ऐसा नहीं कर सके, तो उन पर चाकू से हमला कर दिया गया। इस मामले में आरोपी गिरफ्तार है और एटीएस उसके कथित कट्टरपंथी प्रभाव तथा संभावित ‘लोन वुल्फ’ एंगल की जांच कर रही है। इसी बीच नासिक के टीसीएस बीपीओ मामले में आरोपी निदा खान के मालेगांव और मलेशिया से संबंधों की जांच हो रही है। अभियोजन पक्ष के अनुसार पीड़िता का नाम बदलकर ‘हनिया’ रखने, उसे हिजाब-बुर्का पहनने, नमाज और रोजे जैसी धार्मिक पद्धतियों की ट्रेनिंग देने तथा मोबाइल में इस्लामी रील्स व धार्मिक सामग्री डालने के आरोप सामने आए हैं।
हाइब्रिड कट्टरवाद!
अप्रैल २०२५ के पहलगाम आतंकी हमले में भी प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार पर्यटकों से धर्म पूछा गया और हिंदू पर्यटकों को निशाना बनाया गया। कुछ लोगों से कलमा पढ़ने को कहा गया, ताकि उनकी धार्मिक पहचान की पुष्टि की जा सके। यह हमला केवल आतंकवाद नहीं था, बल्कि धार्मिक पहचान के आधार पर हत्या का भयावह उदाहरण था। इससे पहले उदयपुर में कन्हैयालाल की हत्या और अमरावती में उमेश कोल्हे की हत्या ने भी देश को झकझोर दिया था। दोनों मामलों में एनआईए ने आतंकी और कट्टरपंथी एंगल से जांच की थी। इन घटनाओं ने दिखाया कि सोशल मीडिया, धार्मिक उकसावे और वैचारिक उन्माद का मिश्रण किस तरह आम नागरिकों की जान के लिए खतरा बन सकता है। बंगलुरु के रामेश्वरम वैâफे ब्लास्ट और कोयंबटूर कार ब्लास्ट जैसे मामलों में भी जांच एजेंसियों ने आइसिस प्रेरित कट्टरपंथ, ऑनलाइन संपर्क, फर्जी पहचान, फंडिंग और युवाओं के ब्रेनवॉश जैसे पहलुओं की बात कही है। इन घटनाओं का सबसे खतरनाक पक्ष यह है कि कट्टरता अब केवल बंद कमरों या धार्मिक भाषणों तक सीमित नहीं रही। वह सोशल मीडिया रील्स, ऑनलाइन चैट, धार्मिक पहचान की जांच, जबरन नारे या कलमा पढ़वाने, धर्मांतरण के दबाव और अकेले हमलावरों के रूप में सामने आ रही है।
यही कारण है कि आज ‘हाइब्रिड कट्टरवाद’ शब्द अधिक प्रासंगिक लगता है। यह वह कट्टरता है, जिसमें धार्मिक उन्माद, राजनीतिक ध्रुवीकरण, सोशल मीडिया प्रचार, अंतरराष्ट्रीय संपर्क, पहचान की राजनीति और व्यक्तिगत कुंठाएं मिलकर एक खतरनाक मिश्रण तैयार करती हैं। कहते हैं कि भारत का सामान्य मुसलमान भी उतना ही शांतिप्रिय नागरिक है जितना कोई अन्य भारतीय, लेकिन इस कट्टरपंथ पर उसकी चुप्पी और भी खतरनाक नजर आती है। जब समाज के भीतर से ही ऐसे तत्वों के विरुद्ध स्पष्ट आवाज नहीं उठती, तो कट्टर सोच और निर्भीक हो जाती है। यहां सत्ता और राजनीति की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। जब राजनीतिक लाभ के लिए पहचान की राजनीति, धार्मिक ध्रुवीकरण और वोट बैंक की चुप्पी को बढ़ावा दिया जाता है, तो कट्टरता को ‘नफरत का यूरिया’ मिल जाता है। फिर वह कभी सड़क पर चाकू बनकर दिखती है, कभी दफ्तर में दबाव बनकर, कभी ऑनलाइन रील्स के रूप में और कभी आतंकी हमले के रूप में। किसी भी धर्म, पंथ या विचारधारा के नाम पर यदि व्यक्ति दूसरे नागरिक की आस्था, सुरक्षा और जीवन पर हमला करता है, तो यह कानून-व्यवस्था के साथ-साथ समाज की बुनियादी एकता पर भी हमला है।
कट्टरता सार्वजनिक खतरा
सवाल केवल आरोपी को सजा दिलाने का नहीं है; सवाल यह भी है कि ऐसी सोच पनपती वैâसे है? सरकार, सुरक्षा एजेंसियों, धार्मिक नेतृत्व और नागरिक समाज सभी को मिलकर यह स्पष्ट संदेश देना होगा कि भारत में किसी को भी धर्म पूछकर डराने, अपमानित करने या हमला करने की छूट नहीं दी जा सकती। कट्टरवाद किसी एक समुदाय की सामान्य पहचान नहीं हो सकता, लेकिन जब किसी व्यक्ति के भीतर धार्मिक श्रेष्ठता, नफरत और हिंसा का मिश्रण तैयार होता है, तो वह समाज के लिए विस्फोटक बन जाता है।
मीरा रोड, नासिक, पहलगाम, उदयपुर, अमरावती, बंगलुरु और कोयंबटूर ये सभी घटनाएं एक ही चेतावनी देती हैं: भारत को कट्टरवाद के हर रूप से सावधान रहना होगा। धर्म के नाम पर हिंसा, दबाव, पहचान की जांच या मानसिक ब्रेनवॉश किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता। आज आवश्यकता है कि सत्ता, सुरक्षा एजेंसियां, धार्मिक नेतृत्व और नागरिक समाज बिना किसी वोट बैंक या विचारधारात्मक दबाव के ऐसी घटनाओं की निष्पक्ष जांच करें। कट्टरवाद चाहे किसी भी धर्म, समूह या विचारधारा से निकले, उसे कानून की पूरी कठोरता से रोका जाना चाहिए। इस स्थिति से निपटने के लिए केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, हालांकि कठोर और निष्पक्ष कानून-प्रवर्तन पहली आवश्यकता है। जांच एजेंसियों को हर मामले में राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम करना चाहिए। अदालतों में आरोप सिद्ध होने तक संयम जरूरी है, लेकिन गंभीर आरोपों को हल्के में लेना भी घातक होगा। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कट्टर सामग्री, ब्रेनवॉश करने वाले नेटवर्क और नफरत पैâलाने वाले डिजिटल प्रचार पर कठोर निगरानी आवश्यक है। स्कूलों, कॉलेजों और कार्यस्थलों में संवैधानिक मूल्य, धार्मिक सहिष्णुता और नागरिक अधिकारों पर गंभीर संवाद होना चाहिए।
यहां धार्मिक नेतृत्व की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। यदि किसी धर्म के नाम पर कोई व्यक्ति हिंसा, दबाव या नफरत फैलाता है, तो सबसे पहले उसी समुदाय के जिम्मेदार लोगों को आगे आकर उसकी निंदा करनी चाहिए। चुप्पी कई बार सहमति जैसी दिखने लगती है और यही कट्टर तत्वों की शक्ति बन जाती है। समाज को यह स्पष्ट करना होगा कि आस्था निजी हो सकती है, पर हिंसा कभी धार्मिक नहीं हो सकती। कानून को कठोर होना चाहिए, जांच निष्पक्ष होनी चाहिए और समाज को साफ शब्दों में कहना चाहिए, आस्था निजी हो सकती है, लेकिन कट्टरता सार्वजनिक खतरा है।

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