मुख्यपृष्ठस्तंभतरकश : चुनाव के बाद भी चुनावी मजा

तरकश : चुनाव के बाद भी चुनावी मजा

धनुर्धर
वाकई इस ‘न्यू इंडिया’ का कोई जवाब नहीं। जब से यह आया है, इसने पुरानी चीजों को देखने की नई दृष्टि दे दी है। इस नई दृष्टि का कमाल यह है कि अब हमें कोई पुरानी चीज दिखती ही नहीं। जो भी पुरानी चीज आंखों के सामने आती है, उसका रूप एकदम नया होता है। चाहे लोकतंत्र का मसला हो या चुनाव, मतदान और वोटर का, चाहे ईडी, सीबीआई जैसी एजेंसियों की बात हो या चुनाव आयोग के रोल की।
श्रेय पर हक
लोकतंत्र, चुनाव जैसे मुद्दों पर हम आएंगे, लेकिन उससे पहले, इस बिंदु पर, यह समझ लेना चाहिए कि न्यू इंडिया चूंकि मोदी जी के लाए ही आया है, इसलिए इससे जुड़ी हर चीज का पूरा-पूरा श्रेय उन्हें ही जाता है, उन्हें ही दिया जाना चाहिए। चाहे वे यह बात खुलकर कहें या न कहें। वैसे तो श्रेय लेने के मामले में वे अमूमन संकोच नहीं करते, लेकिन फिर भी, खुदा न खास्ता, आखिर तो पॉलिटीशियन ही हैं, ऐसा मौका आ सकता है जब वे श्रेय अपने नाम खुलकर न कर पाएं। दूसरे निहित स्वार्थी टाइप के तत्व इन मौकों का इस्तेमाल करते हुए श्रेय में अपनी नाक घुसाने की कोशिश कर सकते हैं। इसलिए सबको अपने मन में यह बात अच्छी तरह बैठा लेनी चाहिए कि न्यू इंडिया में श्रेय चाहे किसी भी चीज का क्यों न हो, उस पर हक केवल मोदी जी का बनता है।
असली वाली आजादी
क्या? ओल्ड इंडिया में? अरे भाई, अब जब न्यू इंडिया आ गया है तो फिर ओल्ड इंडिया की बात ही क्यों करना? वैसे भी ओल्ड इंडिया में रखा ही क्या है? लाने लायक जो भी चीज थी, उसे नई सज-धज देकर हम न्यू इंडिया में ला ही चुके हैं। मिसाल के तौर पर आजादी को ही ले लीजिए। कंगना जी जैसी प्रतिभाएं इस तथ्य को स्थापित कर चुकी हैं कि देश को आजादी भी २०१४ में ही मिली। उन्हें मालूम था कि खुद को अक्लमंद माननेवाले कुछ मूर्ख लोग इसे आसानी से स्वीकार नहीं कर पाएंगे इसलिए उन्होंने आजादी के साथ ‘असली’ विशेषण जोड़ दिया और बताया कि १९४७ वाली आजादी तो नकली थी, जो लीज पर मिली थी। असली आजादी देश को २०१४ में मिली जब मोदी जी सिंहासनारूढ़ हुए।
कोई कन्फ्यूजन नहीं
ऐसे में अब यह बात अलग से बताने की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए कि ओल्ड इंडिया यानी २०१४ से पहले के इंडिया में कुछ भी ऐसा था ही नहीं जिसके लिए श्रेय लेने-देने का सवाल भी उठे। विवाद अगर कुछ हो सकता था तो सिर्फ इसी बात पर कि ब्लेम किस पर डाला जाए। लेकिन उसके लिए भी मोदी जी ने एक सिर पहले से तय कर रखा है और वह है नेहरू का। सो, किसी तरह का कोई कन्फ्यूजन नहीं है। ओल्ड इंडिया ही नहीं, अगर न्यू इंडिया की भी कोई ऐसी बात हो जिसे नेगेटिव रूप में लिया जा रहा हो या ऐसा कोई खतरा भी दिख रहा हो तो ठीकरा सीधे नेहरू के सिर फोड़ देना है। ज्यादा सोच-विचार में टाइम वेस्ट करने की जरूरत नहीं है।
सब कुछ फीका-फीका
सच पूछें तो ओल्ड इंडिया और न्यू इंडिया में कोई तुलना ही नहीं हो सकती। ओल्ड इंडिया में सब कुछ घिसा-पिटा सा पुरानी स्टाइल में चल रहा था। सब कुछ तय था। राजनीतिक दल हैं तो वे आपस में लड़ेंगे। अदालतों और एजेंसियों से लेकर चुनाव आयोग तक सभी उस लड़ाई से एकदम निरपेक्ष रहते थे। जैसे उन्हें चुनावी लड़ाई से कोई मतलब ही न हो। नतीजा यह कि सबकुछ फीका-फीका सा रहता था। चुनावी मुकाबले भी वैसे रोमांचक नहीं होते थे।
बढ़ा हुआ रोमांच
अब न्यू इंडिया में देखिए चुनावी गहमागहमी का आलम। ठीक से देखेंगो तो हर शय इसमें शामिल दिखेगा आपको। तभी तो यह संभव हुआ है कि चुनाव के बाद भी चुनावी रोमांच कम नहीं होता। मतों की गिनती होने और नतीजे घोषित होने से पहले तक पक्ष-विपक्ष उत्तेजित-उद्वेलित होते रहते हैं। पश्चिम बंगाल में ही देख लीजिए वैâसे मुख्यमंत्री बीच रात को स्ट्रॉन्ग रूम पहुंच गईं। ऐसा नजारा क्या ओल्ड इंडिया में देखा था कभी?
एक्सक्लूसिव खासियत
लेटेस्ट तो यह है कि अपने शाह जी ने कह दिया है कि चुनाव नतीजे आ जाएं तब भी उसके दो-तीन महीने बाद तक सेंट्रल फोर्स की तैनाती बनी रहेगी बंगाल में। ठीक भी है। चुनाव नतीजे आने के बाद अगर नव-निर्वाचित विधायकों का अचानक हृदय-परिवर्तन कराने की जरूरत आन पड़ी तो उनकी सेफ्टी का सवाल खड़ा हो जाएगा। सो, यह पैâसला जरूरी था। इसे ही कहते हैं नेतृत्व की दूरदर्शिता। लेकिन फिलहाल, आप तो यह देखिए कि चुनाव का ‘फन’ रिजल्ट आने के बाद भी बना रहेगा। एंटरटेनमेंट का यह एक्स्ट्रा डोज तो न्यू इंडिया की ही खासियत है, एक्सक्लूसिवली।

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