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प्रशासन की भारी लापरवाही … मेडिकल छात्रों पर ३६ घंटे ड्यूटी का बोझ! …मेडिकल स्टूडेंट्स की जान दांव पर

सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र में सत्ता की खींचतान का खामियाजा अब मेडिकल स्टूडेंट्स को अपनी सेहत और जिंदगी दांव पर लगाकर भुगतना पड़ रहा है। महायुति सरकार की आंतरिक सियासत के चलते मेडिकल स्टूडेंट्स का ३६-३६ घंटे तक चलने वाली अमानवीय ड्यूटी का सिलसिला बदस्तूर जारी है, जबकि इसे रोकने के लिए नियम और निर्देश पहले ही जारी किए जा चुके हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि छात्र मानसिक और शारीरिक दबाव में टूट रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार तंत्र खामोश नजर आ रहा है। बताया जा रहा है कि सरकार के भीतर समन्वय की कमी और राजनीतिक टकराव के कारण इन आदेशों को दबा दिया गया है, जिससे सुधार के प्रयास जमीन पर उतर ही नहीं पा रहे।
महायुति सरकार की अंदरूनी खींचतान का सीधा असर अब मेडिकल स्टूडेंट्स की जिंदगी पर पड़ता दिख रहा है। राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में अमानवीय ड्यूटी को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। कई स्टूडेंट्स ने दबाव के चलते सीटें छोड़ दीं, जबकि कुछ मामलों में आत्महत्या के प्रयास की खबरों ने हालात की गंभीरता और बढ़ा दी है। इन परिस्थितियों को देखते हुए राज्य सरकार ने केंद्र के नियमों के अनुरूप ड्यूटी तय करने का निर्देश जारी किया था, लेकिन अब वही आदेश सत्ता की राजनीति में उलझकर ठंडे बस्ते में जाता नजर आ रहा है।
फिलहाल आदेश कब जारी हुआ, किस स्तर पर लागू हुआ और क्यों रोका गया इन सवालों पर सचिवालय और स्वास्थ्य विभाग दोनों ही चुप्पी साधे हुए हैं। हालांकि, कुछ मेडिकल कॉलेजों ने ऐसे निर्देश मिलने की पुष्टि की है। सूत्रों के अनुसार, पुणे के बीजे जीएमसी में एक छात्र को लगातार ३६ घंटे की ड्यूटी दिए जाने के बाद मामला मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचा। इसके बाद राज्य स्तर पर तेजी से निर्देश जारी किए गए। सभी विभागाध्यक्षों से २ अप्रैल तक नए ड्यूटी रोस्टर मांगे गए और प्रथम वर्ष के जूनियर रेजिडेंट्स को शुरुआती छह महीनों तक इमरजेंसी ड्यूटी से दूर रखने का भी निर्देश दिया गया। हालांकि, मामला यहीं अटक गया। राज्य में मेडिकल शिक्षा विभाग हसन मुशरिफ के पास होने और बिना समन्वय के निर्णय लिए जाने से महायुति में असहजता बढ़ गई।
बताया जाता है कि इसी राजनीतिक टकराव के चलते आदेश को आगे बढ़ाने के बजाय दबा दिया गया।
निर्धारित है ड्यूटी
केंद्र सरकार के १९९२ के नियमों के अनुसार, पीजी मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए सप्ताह में अधिकतम ४८ घंटे और एक बार में १२ घंटे की ड्यूटी निर्धारित है। इसके बावजूद राज्य के कई कॉलेजों में ३६ घंटे तक लगातार ड्यूटी कराई जा रही है, जिससे न सिर्फ छात्रों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है, बल्कि मरीजों के इलाज की गुणवत्ता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

आदेश को बना दिया गोपनीय
नागपुर के आईजीजीएमसी ने ३० मार्च २०२६ को इस संबंध में आदेश जारी कर नए रोस्टर मांगे थे, लेकिन अब इस आदेश को भी गोपनीय बना दिया गया है।

३० मार्च का सरकारी आदेश तुरंत लागू किया जाए। यह सिर्फ डॉक्टरों का ही नहीं, बल्कि मरीजों के हित का भी सवाल है। हर मेडिकल कॉलेज में इसे लागू किया जाना चाहिए और जहां ओवरड्यूटी की शिकायत हो, वहां संबंधित विभागाध्यक्ष पर कार्रवाई होनी चाहिए।’
– डॉ. लक्ष्य मित्तल,
चेयरपर्सन, यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट

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