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कलात्मक सृजन है अजंता-एलोरा

शीतल अवस्थी

अजंता-एलोरा की गुफाएं संभाजीनगर के समीप स्थित हैं। ये गुफाएं बड़ी-बड़ी चट्टानों को काटकर बनाई गई हैं। २९ गुफाएं अजंता में तथा ३४ गुफाएं एलोरा में हैं। जिन्हें राष्ट्रकूट वंश के शासकों द्वारा बनवाया गया था। इनके रहस्यों पर आज भी शोध जारी है। यहां ऋषि-मुनि और भिक्षु घोर तपस्या और ध्यान करते थे। तभी तो यहां हर-हर महादेव की गूंज आज भी सुनाई देती है। यहां हिंदू, जैन और बौद्ध ३ धर्मों के प्रति दर्शाई गई आस्था के त्रिवेणी संगम का प्रभाव देखने को मिलता है।
संभाजीनगर से लगभग १०७ किमी पर अजंता की गुफाएं पहाड़ को काट कर विशाल घोड़े की नाल के आकार में बनाई गई हैं। अजंता में २९ गुफाओं का एक सेट बौद्ध वास्तुकला, गुफा चित्रकला और शिल्प चित्रकला के उत्कृष्तम उदाहरणों में से एक है। इन गुफाओं में चैत्य कक्ष या मठ है, जो भगवान बुद्ध और विहार को समर्पित हैं, जिनका उपयोग बौद्ध भिक्षुओं द्वारा ध्यान लगाने और बुद्ध की शिक्षाओं का अध्ययन करने के लिए किया जाता था। सह्याद्रि की पहाड़ियों पर स्थित इन गुफाओं में लगभग ५ प्रार्थना भवन और २५ बौद्ध मठ हैं। इनमें २०० ईसा पूर्व से ६५० ईसा पश्चात तक के बौद्ध धर्म का चित्रण किया गया है। दक्षिण की ओर १२ गुफाएं बौद्ध महायान संप्रदाय पर आधारित, मध्य की १७ गुफाएं हिंदू धर्म और उत्तर की ५ गुफाएं जैन धर्म पर आधारित हैं। अजंता की प्रसिद्ध गुफाओं के चित्रों की चमक हजार से अधिक वर्ष बीतने के बाद भी आधुनिक समय से विद्वानों के लिए आश्चर्य का विषय है। भगवान बुद्ध से संबंधित घटनाओं को इन चित्रों में अभिव्यक्त किया गया है। चावल के मांड, गोंद और अन्य कुछ पत्तियों तथा वस्तुओं का सम्मिश्रमण कर आविष्कृत किए गए रंगों से ये चित्र बनाए गए। लगभग हजार वर्ष तक भूमि में दबे रहे और १८१९ में पुन: उत्खनन कर इन्हें प्रकाश में लाया गया। हजार वर्ष बीतने पर भी इनका रंग खराब नहीं हुआ। उसकी चमक यथावत बनी रही। रंगों और रेखाओं की यह तकनीक आज भी गौरवशाली अतीत का याद दिलाती है। दीवारों तथा छतों पर बनाई गई तस्वीरें भगवान बुद्ध के जीवन की विभिन्न घटनाओं और विभिन्न बौद्ध देवत्व की घटनाओं का चित्रण करती हैं। इसमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण चित्रों में जातक कथाएं हैं, जो बोधिसत्व के रूप में बुद्ध के पिछले जन्म से संबंधित विविध कहानियों का चित्रण करते हैं, ये एक संत थे जिन्हें बुद्ध बनने की नियति प्राप्त थी।
जहां तक एलोरा में गुफाओं के मंदिर और मठों का सवाल है तो ये पहाड़ के ऊर्ध्वाधर भाग को काट कर बनाए गए हैं, जो संभाजीनगर के उत्तर में २६ किमी की दूरी पर हैं। एक रेखा में व्यवस्थित ३४ गुफाओं में बौद्ध चैत्य या पूजा के कक्ष, विहार या मठ और हिंदू तथा जैन मंदिर हैं। एलोरा के मंदिर जिनमें ब्राह्मण मंदिर कैलास सबसे विशाल और सुंदर है, इसके सभी भाग निर्दोष और कलापूर्ण हैं। इसकी लंबाई १४२ फुट, चौड़ाई ६२ फुट तथा ऊंचाई १०० फुट है। इस पर पौराणिक दृश्य उत्कीर्ण हैं। लगभग ६०० वर्ष की अवधि में फैले पांचवीं और ग्यारहवीं शताब्दी ए.डी. के बीच यहां के सबसे प्राचीनतम शिल्प धूमर लेना गुफा है।
यूनेस्को द्वारा १९८३ से वर्ल्ड हेरिटेज घोषित किए जाने के बाद अजंता और एलोरा की तस्वीरें और शिल्पकला बौद्ध धार्मिक कला के उत्कृष्ट नमूने माने गए हैं और इनका हिंदुस्थान में कला के विकास पर गहरा प्रभाव है। रंगों का रचनात्मक उपयोग और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उपयोग से इन गुफाओं की तस्वीरों में अजंता के अंदर जो मानव और जंतु रूप चित्रित किए गए हैं, उन्हें कलात्मक रचनात्मकता का एक उच्च स्तर माना जा सकता है। एलोरा में एक कलात्मक परम्परा संरक्षित की गई है जो आने वाली पीढ़ियों के जीवन को प्रेरित और समृद्ध करना जारी रखेंगी। न केवल यह गुफा संकुल एक अनोखा कलात्मक सृजन है साथ ही यह तकनीकी उपयोग का भी उत्कृष्ट उदाहरण है।

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