अनिल तिवारी
बंगाल की राजनीति कल धुएं, नारों और टूटते किलों के बीच खड़ी दिखी। चुनावी परिणामों में भाजपा की कथित आंधी ने तृणमूल कांग्रेस के वर्षों पुराने गढ़ को हिला दिया। उस पर ममता बनर्जी की हार की खबर ने यह सवाल और गहरा कर दिया कि आखिर दीदी को दगा किसने दिया, समर्थकों ने, केंद्र की सरकार ने या फिर चुनाव के पूरे सिस्टम ने?
कल कोलकाता में मतगणना के दौरान तृणमूल कार्यालय के बाहर भारी हंगामा हुआ। आसनसोल में टीएमसी दफ्तर में आगजनी की सूचना आई, वहीं भाजपा और टीएमसी समर्थकों के बीच झड़पों के बाद पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। राज्य के कई इलाकों से दोनों दलों के कार्यकर्ताओं में टकराव की खबरें आती रहीं। भवानीपुर में ममता बनर्जी के घर के बाहर भाजपा समर्थकों ने नारेबाजी की, तो हुगली और फलता जैसे क्षेत्रों में पुनर्मतदान के दौरान हिंसा और मतदाताओं को डराने के आरोपों ने माहौल को और तनावपूर्ण बना दिया। इस बीच पीएम मोदी ने इसे ‘जनशक्ति की विजय’ बताया तो अमित शाह ने ‘भय और तुष्टीकरण पर प्रहार’ कहा। कहा गया कि चुनाव आयोग ने सुरक्षा कड़ी कर रखी थी, क्योंकि बंगाल में चुनाव बाद हिंसा की आशंका पहले से बनी हुई थी। शायद नतीजों का अंदाजा सभी को लग चुका था। खैर, अब आने वाले वक्त में बंगाल की राजनीति किस करवट बैठती है। मतदाता क्या संदेश देते हैं, दीदी चुप रहती हैं या और आक्रामकता से जवाब देती हैं, इस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।
