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संपादकीय : आखिर ये जीतते कैसे हैं?

पांच राज्यों के चुनाव परिणाम भारतीय जनता पार्टी ने जैसा तय किया था, उसी के अनुरूप आए हैं। मोदी-शाह ने चुनावों पर कब्जा करने का एक ‘पैटर्न’ निर्धारित किया है। इसी पैटर्न के अनुसार भाजपा ने असम और पश्चिम बंगाल में जीत हासिल की। इसी पैटर्न के चलते तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन कराकर ‘द्रमुक’ को बाहर कर दिया गया। अभिनेता विजय की ‘टीवीके’ पार्टी को स्पष्ट बहुमत तो नहीं मिला, लेकिन मतों के विभाजन के कारण यह निश्चित हो गया है कि वह सौ से अधिक सीटें जीतेगी। द्रमुक-कांग्रेस गठबंधन को ७० के आसपास तो भाजपा-अन्ना द्रमुक गठबंधन को ५० के इर्द-गिर्द सीटें मिलेंगी। केरल में जहां कांग्रेस ने बढ़त बनाई, वहीं असम में भाजपा को बड़ी सफलता मिली। पुडुचेरी में भी भाजपा फिर से अपनी सत्ता बचाने में सफल रही। पांच राज्यों के ये चुनावी नतीजे भाजपा के लिए ‘गेम चेंजर’ साबित हुए हैं, लेकिन ऐसा नहीं लगता कि ये परिणाम सीधे और सहज मार्ग से आए हैं। ​सबसे अधिक उत्सुकता इस बात की थी कि पश्चिम बंगाल में क्या होगा! ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने इससे पहले लगातार तीन चुनाव जीते थे। इस दौरान ममता बनर्जी को पराजित करने के लिए मोदी-शाह ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था, परंतु वे सफल नहीं हो सके। मगर इस बार मोदी-शाह को चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के रूप में एक तीसरा साथी मिल गया, जिससे भाजपा को वर्तमान चुनाव में सफलता प्राप्त हुई। ​पश्चिम बंगाल में भाजपा की इस जीत का श्रेय मुख्य रूप से चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को देना होगा। वे बंगाल चुनाव के दौरान भाजपा के किसी मित्र दल की भांति सक्रिय रहे। राज्य में तीन लाख अर्धसैनिक बल उतारे गए और राज्य सरकार के सभी अधिकारियों को निर्वाचन क्षेत्र से बाहर भेज दिया गया। चुनाव निष्पक्ष हों, यह उनका ‘उदात्त’ उद्देश्य बताया गया, लेकिन यही ‘उदात्तता’ उन्होंने असम चुनाव के दौरान नहीं दिखाई। पश्चिम बंगाल में
सत्ता स्थापना का सपना
मोदी-शाह ने संजोया था। इसके लिए बंगाल की मतदाता सूची से ९२ लाख मतदाताओं के नाम उड़ा दिए गए। इनमें से अधिकांश ममता बनर्जी के समर्थक मतदाता थे। भारतीय जनता पार्टी चुनाव किस तरह लड़ती और जीतती है, यह एक बार फिर स्पष्ट हो गया। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के नतीजे राष्ट्रीय राजनीति पर दूरगामी प्रभाव डालनेवाले हैं। चुनाव आयोग ने जिस बेईमान तरीके से काम किया, उसे देखते हुए विपक्षी दलों को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा कि भविष्य में चुनाव लड़ें या नहीं। पश्चिम बंगाल में मतदान के तुरंत बाद भाजपा ने विजयोत्सव की तैयारी शुरू कर दी, जो रहस्यमयी है। इसका अर्थ यही है कि भाजपा ने जीत के सारे षड्यंत्र पर्दे के पीछे पहले ही रच लिए थे। लोकतंत्र में यदि चुनाव निष्पक्ष हों, तो ‘हार’ को भी दिलदार होकर स्वीकार करना चाहिए। जनता के जनादेश का सम्मान करना चाहिए, लेकिन वर्तमान में जिस तरह से परिणाम आ रहे हैं, उन्हें जनमत नहीं कहा जा सकता; बल्कि ये चुनाव आयोग के सहयोग से भाजपा द्वारा थोपे गए परिणाम कहे जाएंगे। पश्चिम बंगाल में यह स्पष्ट रूप से दिखा। इससे पहले महाराष्ट्र और हरियाणा में भी यही ‘पैटर्न’ दिखाई दिया था। यह भारतीय लोकतंत्र का पतन है और चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। इन सबकी शिकायत लेकर यदि सुप्रीम कोर्ट जाना चाहें, तो वहां भी मोदी-शाह के ‘पैटर्न’ ने सबकी बोलती बंद कर दी है। हर दिन पैदा हो रही ऐसी स्थिति में इस व्यवस्था पर से भी विश्वास उठ जाना स्वाभाविक है। तमिलनाडु में द्रमुक और अन्ना द्रमुक बारी-बारी से सत्ता में आते रहे हैं। लेकिन इस बार एक तीसरे खिलाड़ी ने
तमिल जनता का मन
जीत लिया। अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके को भारी जनसमर्थन मिला। द्रमुक नेता व मुख्यमंत्री स्टालिन तमिल अस्मिता के लिए लड़ रहे थे और उन्होंने एक बार फिर हिंदी का कड़ा विरोध किया। क्या उन्हें इसका नुकसान उठाना पड़ा? नई पीढ़ी और मतदाताओं की सोच बदल रही है, लेकिन पुराने ढर्रे के नेता और दल इस पर विचार करने को तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि द्रमुक-अन्ना द्रमुक को छोड़कर तमिल जनता ने तीसरा विकल्प चुना। जनता बदलाव चाहती है, यह स्वीकार्य है, लेकिन फिर वे असम में भाजपा की ‘अराजकता’ को क्यों नहीं बदलते? मोदी-शाह की व्यापारिक शैलीवाली शासन व्यवस्था देश में विफल रही है। गरीब और मध्यम वर्ग का जीवन इस व्यवस्था ने अत्यंत कठिन कर दिया है। महंगाई चरम पर है, बेरोजगारी बढ़ गई है और देश आर्थिक मंदी की चपेट में है। इसके बावजूद असम और पश्चिम बंगाल में भाजपा को वोट मिले, तो इसका कारण केवल वह जातीय धार्मिक तनाव और विद्वेष का वातावरण है, जिसमें भाजपा ने निरंतर घी डालने का काम किया। पश्चिम बंगाल की जीत के बाद भाजपा नेताओं ने कहा कि हिंदुओं ने ममता बनर्जी को वोट नहीं दिया। भाजपा के चुनाव लड़ने का यही असली ‘पैटर्न’ है। देशभर में महिलाओं पर अत्याचार बढ़ रहे हैं। महाराष्ट्र में मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म कर उनकी हत्या की जा रही है। फिर भी लोग यह सब स्वीकार कर रहे हैं और भाजपा के इस दमनकारी शासन के पक्ष में मतदान कर रहे हैं। जब बच्चियों के साथ हो रहे अनाचार से धरती कांप रही है, तब चुनावी जीत पर ‘उत्सव’ मनाना लोकतंत्र का वीभत्स रूप है। यदि ऐसी विकृति को कोई धर्म की विजय कहता है तो धर्म की रक्षा के लिए भविष्य में पृथ्वी पर कोई अवतार नहीं होगा, क्योंकि वास्तविक धर्म का तो विनाश होता दिख रहा है।

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