मुख्यपृष्ठस्तंभविक्रम-बेताल : यह लोकतंत्र नहीं जोर तंत्र है!

विक्रम-बेताल : यह लोकतंत्र नहीं जोर तंत्र है!

 

मनमोहन सिंह

आधी रात का सन्नाटा, श्मशान की डरावनी खामोशी और राजा विक्रम के कंधों पर लटकता वह भारी शव यानी बेताल। अचानक, मुर्दे के भीतर से एक ठहाका गूंजा।
`हा हा हा…ठहर राजन! तू भी क्या हठी जीव है। माना कि तू न्यायप्रिय है, पर क्या तूने कभी उस न्याय की चीख सुनी है, जो सत्ता के ढोल-नगाड़ों में दब जाती है? चल, राह लंबी है, सो तुझे एक कहानी सुनाता हूं। ध्यान से सुनना, क्योंकि अगर तूने मौन तोड़ा तो मैं उड़ जाऊंगा और अगर जानकर भी चुप रहा तो तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे!’
कहानी: आम आदमी का विश्वास
बेताल ने कहानी शुरू की, `विक्रम, एक नगर था, जिसका नाम था लोकपुर। वहां हर पांच साल में एक उत्सव मनाया जाता था, जिसे लोग मतदान कहते थे। २०२६ का साल था। चारों तरफ शोर था। कोई लहर की बात कर रहा था तो कोई गठबंधन की गोटियां फिट कर रहा था।’ `नगर के चौराहे पर एक आम आदमी खड़ा था, नाम था उसका ईमानदार। उसके हाथ में डिग्रियां थीं, पर जेब में फटी हुई उम्मीदें। उसने देखा कि नेता जी मंच पर चढ़कर मुफ्त की रेवड़ियां बांट रहे हैं और उधर रसोई में उसकी पत्नी दाल की बढ़ती कीमतों को देखकर आंसू पी रही है। ईमानदार ने जिसे अपना प्रतिनिधि चुनकर भेजा था, वह अगली सुबह किसी रिजॉर्ट में दूसरी पार्टी के साथ मलाई छान रहा था। `भाई-भाई’ के बीच नफरत की ऐसी दीवार खड़ी कर दी गई कि अब त्योहारों के रंग भी फीके लगने लगे थे।’
बेताल कुछ क्षण के लिए रुका फिर बोला, `देख राजन! ये वैâसा तमाशा है? आम आदमी के नाम पर लोग राजा बन जाते हैं और फिर उसी आम आदमी को अंगूठा दिखाते हैं। बता विक्रम, जिसकी थाली से महंगाई ने निवाला छीन लिया, क्या उसके लिए लोकतंत्र का कोई मोल है? जो युवा अपनी डिग्रियां रद्दी के भाव बेचने को मजबूर हैं, क्या उनके लिए स्टार्टअप का नारा मरहम बनेगा? और सबसे बड़ी बात, जब जनता का वोट नीलाम होने लगे तो क्या वह देश गणतांत्रिक कहलाने लायक है या मंडी बाजार जहां बोलियां लगती हों?
विक्रम चलते-चलते रुक गए। उन्होंने बेताल को दाएं कंधे से उठाकर बाएं कंधे पर रख दिया फिर गंभीर स्वर में बोले, `सुन बेताल! मैंने तुझे दाएं कंधे से उठाकर बाएं कंधे पर रख दिया, क्योंकि मेरे दाएं कंधे में दर्द होने लगा था, लेकिन कुछ समय बाद बाएं में भी दर्द होने लगेगा। जब तक तू कंधे पर है दर्द बना रहेगा। आम आदमी का दर्द भी कुछ इसी तरह है। यह दर्द नया नहीं है, पर यह तस्वीर डरावनी है।’ `हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े-लिखे को फारसी क्या, जब पेट खाली हो, तो विचारधारा की बातें बेमानी हो जाती हैं।’ `आज का राजनेता मुंह में, राम बगल में छुरी लेकर घूम रहा है। वोट मांगते समय पैर पकड़ता है और जीतने के बाद पहचानता तक नहीं।’
`जो दल-बदल हो रहा है, वह लोकतंत्र के माथे पर कलंक है। यह तो वही बात हुई कि खेत खाए बाड़, तो रखवाली कौन करे।’ बेताल बोला, `सत्य कहा राजन, पर विडंबना देख, यही आम आदमी जो आज ठगा जा रहा है, कल फिर किसी नए वादे के जाल में फंसेगा। यहां अंधेर नगरी चौपट राजा वाला हिसाब है। संवैधानिक संस्थाएं आज वक्त की नजाकत देखकर आंखें मूंद लेती हैं। आम आदमी की हालत वैसी ही है जैसे धोबी का कुत्ता, न घर का न घाट का। उसे धर्म और जाति के नाम पर लड़ाकर सत्ता के गलियारों में अपनी खिचड़ी अलग पकाई जा रही है।
अब बता विक्रम, इस २०२६ के लोकतांत्रिक छोटे उत्सव में हार किसकी हुई? उस नेता की जो नैतिकता को ताक पर रखकर जीत गया, जो जीत कर हार गया या उस आम आदमी की जिसने अपना भरोसा खो दिया? अगर तूने इसका सही न्याय नहीं किया, तो समझ ले तेरा न्याय भी उसी नगर का लोकतंत्र है!’
विक्रम बोले, `न जाने क्यों आज तू अधिक भारी लग रहा है बेताल, आज तेरी बातें भी भारी हैं और तेरे सवाल भी। इस युद्ध में जीत सत्ता की हुई, पर हार विश्वास की हुई। जब रक्षक ही अपना कर्तव्य भूल जाए और जनता का वोट रिजॉर्ट पॉलिटिक्स की भेंट चढ़ जाए तो समझो समाज की जड़ें खोखली हो चुकी हैं। आम आदमी आज पाने की खुशी नहीं, बल्कि जो बचा है उसे खोने के डर में जी रहा है। यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि जोर तंत्र है बंदरबांट है!’
`चतुर है राजन! पर तूने बोलकर अपना मौन तोड़ दिया। अब मैं चला फिर मिलेंगे उसी पेड़ पर!’ बेताल बोला और खिल-खिलाकर उड़ गया। परंतु आज विक्रम उसके पीछे दौड़े नहीं कुछ सोचते हुए बियाबान में घुस गए!

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