प्रलय!

यह मेरी भारत भूमि की नहीं
यह पृथ्वी की कहानी है
इस धरती पर उत्पत्ति और विनाश की
शाश्वत कथा मुंह जुबानी है
प्रलय की धारणा केवल सनातन संस्कृति ही नहीं बताती
सभी धर्मों के पास अपने विश्वास की एसी ही बयानी है।
तृण विहीन धरा पुनः हरियाती है
जन विहीन वसुधा, जीवन के गीत गाती है।
सतनीरा तटों पर प्रथम जीवन नाद गूंजता है
गांव, कस्बे नगरों में प्रथम बसेरा होता है।
किसानी से मानव जीवन की सभी
अपरिहार्यता पूरी होती हैं
अपनी संतुष्टि कर चतुष्पदों पंछियों को मानव जाति पालती है।
सरल सहज मानव जब विकास पथ पर चलता है
भौतिकता की चकाचौंध से भरमाता जाता है
करता खिलवाड़ प्रकृति मां से
अपने सर्वनाश के मार्ग पर चलता जाता है
आरण्यों का कर दिया विनाश
वृक्ष विहीन हो गई धरा
अति दोहन कर लिया प्राकृतिक सम्पदा का
अकाल, बाड़, भूस्खलन की मार झेल रहा है
गरीबी, कंगाली, भूख, बिमारी को नहीं हरा पाया अब तक
जन संख्या वृद्धि विस्फोटक अंकों तक बढ़ रही
विस्तार वाद में पड़ कर युद्धों की भयावहता को झेल रही
सैन्य उपकरणों के बाजार की आढ में
परस्पर देशों को युद्ध में उलझाया जा रहा
आमने-सामने की लड़ाइयों का युग हुआ समाप्त
गगनभेदी, सूदूर मारक यंत्र, बमों का होता परीक्षण
विश्व पुनः विनाश की कगार पर आ गया
प्रदूषण, विश्व तापमान बड़ गया
ध्रुवों के हिमखंड गल गये, ऋतुओं में आमूल परिवर्तन आया
भूख और बिमारियों का विभत्स रूप दिख रहा
फिर धरा पर जीवन विनाश का
बिगुल बजने लगा
चेत जा मानव तेरी अपनी कुरीतियां तुझे बताएंगी
प्रलय आने को है, प्रलय पुनः आयेगी।
मनु और इड़ा आ कर मानव जीवन का बीज रोपेंगे।
पुनः धरा मानव जीवन से गुंजित होगी।
-बेला विरदी

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