नरेंद्र पुण्डरीक, बांदा (उत्तर प्रदेश)
दिल्ली, कोलकाता और मुंबई का नाम लेते ही पूरे देश के जनमानस की आकांक्षाएं, सपने, संघर्ष और संभावनाएं आंखों के सामने साकार हो उठती हैं। इन महानगरों में भी मुंबई का स्थान विशिष्ट है। यह केवल सपनों की नगरी नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की राजधानी, श्रम और संघर्ष की भूमि तथा विविध संस्कृतियों के संगम का महानगर है। इसी कारण इसे अवसरों की नगरी कहा गया है, तो कभी तस्करी, अपराध और माफिया संस्कृति की नगरी के रूप में भी देखा गया है। परंतु इन सभी विरोधाभासों के बीच मुंबई का जो वास्तविक चेहरा है, उसे कवि बालासाहेब लबडे ने अपने काव्य-संग्रह ‘मुंबई… बंबई… बॉम्बे…’ में अत्यंत संवेदनशीलता और व्यापक दृष्टि के साथ प्रस्तुत किया है।
इस संग्रह की कविताएं पढ़ते हुए ऐसा अनुभव होता है कि कवि ने मुंबई को केवल देखा भर नहीं, बल्कि उसके एक-एक कण, एक-एक गली, एक-एक मोहल्ले और उसके समूचे जनजीवन को जीया है। इन कविताओं के प्रत्येक शब्द में मुंबई की धड़कन सुनाई देती है। यहाँ की सड़कें, फुटपाथ, झुग्गियाँ, बाजार, लोकल ट्रेनें, समुद्र किनारे, गलियां और मोहल्ले जीवंत होकर पाठक के सामने उपस्थित हो जाते हैं। हिंदी की सहजता, बम्बइया हिंदी की मिठास, स्थानीय बोली की लय तथा महानगरीय जीवन की विशिष्ट गंध इन कविताओं को एक अलग पहचान प्रदान करती है।
इन कविताओं को पढ़ते ही मुंबई के उस जनजीवन का साक्षात्कार होता है, जो सामान्यतः दिखाई नहीं देता। यह इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है। पढ़ते हुए पाठक के सामने जनजीवन का एक विस्तृत खाका उभरता है, जहां लोगों की हर्ष-उल्लास, पीड़ा, दुख, संघर्ष, आशा और निराशा एक साथ दिखाई देती हैं। कवि केवल दृश्य प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि उन दृश्यों के भीतर छिपी संवेदनाओं तक पहुंचता है। इन कविताओं में करुणा का एक विशाल महासागर दिखाई देता है, जो कवि के मानवीय सरोकारों और गहरी संवेदनशीलता का परिचय कराता है।
कवि अपने पाठकों को मुंबई के प्रत्येक ठीहे, गली, मोहल्ले और अड्डे से परिचित कराता है। वह केवल स्थानों का वर्णन नहीं करता, बल्कि वहाँ की सम्मिलित संस्कृति, सामाजिक संरचना और जीवन-व्यवहार को भी सामने लाता है। संग्रह में शामिल ‘धारावी’, ‘मरीन ड्राइव’, ‘हाजी अली’, ‘शिवाजी पार्क’, ‘मुंबादेवी’, ‘फूलगली’, ‘राजाबाई टॉवर’, ‘अंधेरी’, ‘बोरीवली फास्ट’, ‘मुंबई के भाई लोग’ और ‘मालाड मोहल्ला’ जैसी कविताएँ बार-बार पाठक को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। इन कविताओं में महानगर के बहुआयामी जीवन का ऐसा चित्र उपस्थित हुआ है, जो साहित्य में विरल है।
कवि की दृष्टि केवल बाहरी चमक-दमक तक सीमित नहीं है। वह उन सच्चाइयों को भी सामने लाता है जिन्हें अक्सर जानबूझकर अनदेखा कर दिया जाता है। गरीबों के घर, उनकी गलियां, नालियाँ, चूल्हे, झुग्गियां, पीली-लाल बत्तियां, फुटपाथों पर गुजरती ज़िंदगियां, लोकल ट्रेनों की भीड़ और रोज़मर्रा का संघर्ष इन कविताओं में बराबर उपस्थित है। मुंबई की चकाचौंध के समानांतर चलने वाले इस यथार्थ को कवि अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करता है।
संग्रह की अनेक पंक्तियां कवि की वैचारिक तीक्ष्णता और सामाजिक दृष्टि का परिचय देती हैं। उदाहरण के लिए—
“उन्हें है गर्व
संस्कृति पर,
देश पर, धर्म पर,
राजनीति पर, उन्नति पर,
शांतिप्रिय लोगों पर,
अहिंसात्मक लोगों पर,
सचिन के लगाए छक्के पर।
ओ हो जाते हैं खुश,
पीटते हैं तालियां,
लबालब पेशाबघरों की
घिनौनी गृहस्थियां
चलती रहती हैं
एक-दो रुपए के
शौचालयों में।”
ये पंक्तियां केवल एक दृश्य प्रस्तुत नहीं करतीं, बल्कि समाज के भीतर मौजूद विडंबनाओं की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती हैं। एक ओर गर्व और उत्सव का शोर है, दूसरी ओर मनुष्य की बुनियादी आवश्यकताओं की उपेक्षा। यही वह दृष्टि है जो कवि को एक सजग सामाजिक रचनाकार बनाती है। इन पंक्तियों में कवि का अंतर्भाव और उसका सामाजिक सरोकार स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
इन कविताओं की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि वे मराठी से हिंदी में अनूदित हैं। अनुवाद केवल शब्दों का रूपांतरण नहीं होता, बल्कि मूल भाषा की आत्मा को दूसरी भाषा की आत्मा में प्रतिष्ठित करने की प्रक्रिया है। इस दृष्टि से अनुवादक भारत वेडे का कार्य अत्यंत प्रशंसनीय है। कविताओं को पढ़ते हुए लगातार यह अनुभव होता है कि अनुवादक ने मूल कविता की संवेदना, लय, वातावरण और आत्मा को पूरी निष्ठा के साथ हिंदी में रूपांतरित किया है। कहीं भी संप्रेषण बाधित नहीं होता। इसके विपरीत, हिंदी पाठक इन कविताओं से सहज रूप से जुड़ जाता है।
अनुवाद की सफलता का एक प्रमुख कारण यह है कि मुंबई में बोले जाने वाले अनेक स्थानीय शब्दों और भाषिक रंगों को यथासंभव सुरक्षित रखा गया है। इससे कविताओं की स्थानीयता और प्रामाणिकता बनी रहती है। यही कारण है कि ये कविताएँ अपने पाठकों के बीच बिना किसी अवरोध के संवाद स्थापित करती हैं। मूल कवि की उपस्थिति भी पाठकों के बीच अक्षुण्ण बनी रहती है।
बालासाहेब लबडे की इन कविताओं में जीवनानुभव और सामाजिक अनुभव का विशाल संसार मौजूद है। जब किसी कवि के पास अनुभव का इतना व्यापक प्रकाशस्तंभ हो, तब उसकी दृष्टि से समाज का कोई भी पक्ष छिपा नहीं रह सकता। यही कारण है कि ये कविताएँ केवल मुंबई का वर्णन नहीं करतीं, बल्कि उसके बहुआयामी चरित्र को उसकी संपूर्णता में उद्घाटित करती हैं।
मेरा विश्वास है कि यह काव्य-संग्रह हिंदी पाठकों के बीच अत्यंत सम्मान और लोकप्रियता प्राप्त करेगा। हिंदी कविता के इतिहास में इसकी उपस्थिति एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में दर्ज होगी। यह संग्रह अपने विशिष्ट शिल्प, नवीन कथ्य, व्यापक सामाजिक दृष्टि और मानवीय संवेदना के कारण एक नए काव्य इतिहास की रचना करता है। निस्संदेह, ‘मुंबई… बंबई… बॉम्बे…’ हिंदी और मराठी साहित्य के बीच एक सशक्त सेतु का कार्य करेगा तथा समकालीन भारतीय कविता में अपनी महत्वपूर्ण पहचान स्थापित करेगा।
मैं कवि बालासाहेब लबडे को इस महत्वपूर्ण कृति के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ। साथ ही अनुवादक भारत वेडे को भी विशेष बधाई, जिन्होंने अत्यंत सुरुचिपूर्ण और संवेदनशील अनुवाद के माध्यम से इन कविताओं को हिंदी पाठकों तक पहुँचाया। कई बार एक उत्कृष्ट अनुवाद का श्रम मूल रचना के सृजन जितना ही महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण होता है। इस दृष्टि से भारत वेडे का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
निश्चित रूप से मुंबई पर लिखी गई ये कविताएं आने वाले समय में अपनी सशक्त और स्थायी उपस्थिति दर्ज कराएँगी।
