श्रीकिशोर शाही
(सत्ता में सुंदरी की घुसपैठ-७)
लेडी श्रीराम कॉलेज के गलियारों से लेकर कनॉट प्लेस की सड़कों तक, पामेला सिंह अब दिल्ली में एक पहचाना हुआ चेहरा बनती जा रही थी। ७० के दशक का अंत और ८० के दशक की शुरुआत, यह वह दौर था, जब भारत में पैâशन और मॉडलिंग की दुनिया करवट ले रही थी। पत्रिकाओं के कवर ग्लैमरस हो रहे थे और विज्ञापनों की दुनिया में नए, बोल्ड चेहरों की तलाश तेज हो गई थी। पामेला ने इस मौके को तुरंत भांप लिया।
पामेला को बहुत कम उम्र में ही एहसास हो गया था कि उसका आकर्षक सांवला रंग और उसके तीखे नैन-नक्श बिल्कुल साधारण नहीं हैं। जब वह गुजरती थी तो लोग मुड़कर देखने पर मजबूर हो जाते थे। यह सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता नहीं थी, यह उसका बेखौफ आत्मविश्वास था, जो उसे पूरी भीड़ से अलग करता था। एक अनुशासित फौजी परिवार की पृष्ठभूमि के बावजूद, पामेला ने पुरानी सामाजिक बंदिशों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया। उसने समझ लिया था कि उनका सबसे बड़ा हथियार उनका रूप है, और वह इसका इस्तेमाल अपनी तकदीर बदलने के लिए करने वाली थी।
दिल्ली के छोटे पैâशन शोज और प्रिंट विज्ञापनों से शुरुआत करते हुए पामेला ने मॉडलिंग की दुनिया में मजबूती से अपने कदम जमा लिए। वैâमरे के सामने उसकी झिझक कभी नजर नहीं आई, मानो वह इसी चकाचौंध के लिए ही पैदा हुई थी। नामी फोटोग्राफर्स उसके आकर्षण के कायल होने लगे थे और जल्द ही उसे शहर के बेहतरीन मॉडलिंग असाइनमेंट मिलने लगे। लेकिन पामेला किसी छोटी सफलता से संतुष्ट होकर रुकने वालों में से नहीं थी। लोकल पैâशन शोज की तालियां उसके कानों के लिए काफी नहीं थीं। वह समझ चुकी थी कि केवल दिल्ली की मॉडलिंग उसे वहां तक नहीं ले जाएगी, जहां वह असल में जाना चाहती थी। उसे एक ऐसा बड़ा मंच चाहिए था, जो रातों-रात उसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिला सके। पामेला की महत्वाकांक्षा अब एक गहरे जुनून में बदल चुकी थी। उसका लक्ष्य अब शीशे की तरह साफ था, भारत की सबसे खूबसूरत महिला का ताज। उसने बिना समय बर्बाद किए अपनी निगाहें देश के सबसे बड़े सौंदर्य मंच ‘मिस इंडिया’ पर टिका दीं। यह उनके लिए सिर्फ एक प्रतियोगिता नहीं थी, यह उस बंद दरवाजे की इकलौती चाबी थी, जिसके पार शोहरत और चकाचौंध की वह विशाल दुनिया बसी थी, जिसके उसने हमेशा सपने देखे थे।
(शेष अगले अंक में)
