(सत्ता में सुंदरी की घुसपैठ-१०)
श्रीकिशोर शाही
मिस यूनिवर्स के भव्य मंच ने पामेला को पूरी दुनिया की चकाचौंध दिखा दी थी और अब भारत की सीमाएं उसे एक छोटे पिंजरे जैसी लगने लगी थीं। अपने असीम सपनों को उड़ान देने के लिए पामेला ने बिना किसी हिचकिचाहट के यूरोप का रुख कर लिया। पेरिस और लंदन जैसे शहर, जो उस दौर में दुनिया के पैâशन, रसूख और ग्लैमर की असली राजधानी माने जाते थे, अब पामेला की नई कर्मभूमि बनने के लिए तैयार थे।
लेकिन यूरोप का यह नया सफर शुरुआत में बिल्कुल भी आसान नहीं था। भारत में वह ‘मिस इंडिया’ थी, हर मशहूर मैगजीन के कवर पर उसकी तस्वीर छपती थी और लोग उसे पहचानते थे। लेकिन पेरिस और लंदन की अनजान सड़कों पर वह महज एक संघर्षरत लड़की थी। यूरोप की हाई-सोसायटी और पैâशन की बेरहम दुनिया में प्रवेश पाना लोहे के चने चबाने जैसा था। वहां की प्रतिस्पर्धा भारत से कहीं ज्यादा क्रूर थी। शुरुआती दिनों में पामेला को कई जगह रिजेक्शन का सामना भी करना पड़ा। जल्द ही उसे यह कड़वा सच समझ में आ गया कि यहां सिर्फ एक खूबसूरत चेहरा होना बिल्कुल काफी नहीं है, यहां सफलता के लिए रसूख, पैसा और सही लोगों के साथ मजबूत पहचान होना सबसे ज्यादा जरूरी है।
पामेला इतनी जल्दी हार मानकर वापस लौटने वालों में से नहीं थी। उसके अंदर की वह पुरानी फौजी जिद, जिसने उसे मिस इंडिया का ताज दिलाया था, फिर से जाग उठी। उसने तुरंत अपनी रणनीति बदली और यूरोप के एलीट क्लबों, महंगी पार्टियों और रईसों के आयोजनों पर अपनी पैनी नजर रखनी शुरू कर दी। उसने अपनी बात करने के तरीके, अपने महंगे पहनावे और अपने तौर-तरीकों को पूरी तरह से एक ‘यूरोपीय सोशलाइट’ की तरह ढाल लिया ताकि वह उस एलीट वर्ग का हिस्सा लग सके।
यह पामेला की जिंदगी का वह सबसे अहम मोड़ था, जहां उसकी महत्वाकांक्षाएं एक नए स्तर पर पहुंच रही थीं। वह अब सिर्फ एक मॉडल बनकर नहीं रहना चाहती थी। वह सत्ता, पैसे और ताकत के उस संभ्रांत घेरे पर राज करना चाहती थी। लेकिन इस अभेद्य घेरे में घुसने के लिए उसे एक ‘पासपोर्ट’ की सख्त जरूरत थी, सिर्फ यात्रा करने वाला पासपोर्ट नहीं, बल्कि एक ऐसा ठोस जरिया जो उसे रातों-रात उस मुकाम तक पहुंचा दे। और इसी बेचैन तलाश ने जल्द ही उसके जीवन में एक ऐसे व्यक्ति की एंट्री कराई, जो हमेशा के लिए उसका नाम और उनकी तकदीर दोनों बदलने वाला था।
(शेष अगले अंक में)
