ढोल-दमऊ की थाप, मशकबीन की गूंज और ‘मेरो पहाड़’ के सुरों के साथ नवी मुंबई के सानपाड़ा स्थित झांसी की रानी मैदान में कौथिग 2026 का शानदार आगाज हो गया है। 18 मई तक चलने वाला यह महोत्सव केवल एक मेला नहीं, बल्कि मुंबई में बसे उत्तराखंडियों के लिए अपनी जड़ों, संस्कृति और बोली-भाषा से जुड़ने का बड़ा उत्सव बन गया है। कौथिग को मुंबई में पहचान दिलाने वाले मुख्य सूत्रधार केसर बिष्ट ने ‘दोपहर का सामना’ के संवाददाता से विशेष बातचीत में इस सांस्कृतिक यात्रा के कई पहलुओं को साझा किया।
कौथिग की शुरुआत कैसे हुई?
वर्ष 2008 में जब कौथिग की शुरुआत हुई, तब हमारा उद्देश्य बिल्कुल साफ था। मुंबई में रहने वाले उत्तराखंड के प्रवासियों के पास अपनी संस्कृति, संगीत, खान-पान और परंपराओं से जुड़ने का कोई साझा मंच नहीं था। हमने महसूस किया कि महानगर की भागदौड़ में हमारी पहाड़ी पहचान और बोली-भाषा धीरे-धीरे खोती जा रही है। इसी सोच के साथ कौथिग की शुरुआत की गई।
इन 16 वर्षों में कौथिग में क्या बदलाव आया?
शुरुआत में यह एक छोटा सामुदायिक आयोजन था, लेकिन आज यह एक बड़े सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले चुका है। पहले कार्यक्रम केवल मेल-मिलाप तक सीमित था, जबकि अब इसमें आधुनिक तकनीक, भव्य मंच और डिजिटल माध्यम भी जुड़ गए हैं। इससे इसकी पहुंच देश और दुनिया तक बढ़ी है।
कौथिग से उत्तराखंड के स्थानीय उत्पादों को कितना लाभ मिला?
अब कौथिग केवल मनोरंजन का मंच नहीं रहा, बल्कि यह एक बड़ा आर्थिक बाजार भी बन गया है। यहां गहत की दाल, मंडुआ का आटा, झंगोरा, पहाड़ी नमक और हस्तशिल्प उत्पादों की बिक्री होती है। इससे पहाड़ के किसानों और कारीगरों को सीधा लाभ मिल रहा है।
नई पीढ़ी के लिए इस आयोजन का क्या महत्व है?
सबसे बड़ी सफलता यही है कि मुंबई में जन्मे और पले-बढ़े बच्चे इस मंच के माध्यम से अपनी जड़ों और बोली-भाषा से जुड़ पा रहे हैं। यह आयोजन युवाओं में अपनी संस्कृति और परंपरा के प्रति गर्व पैदा करता है।
इस बार के कौथिग में क्या खास रहेगा?
इस बार आयोजन पहले से ज्यादा आधुनिक और व्यवस्थित है। सबसे बड़ा आकर्षण “डिजिटल कौथिग” है, ताकि दुनिया के किसी भी कोने में बैठा उत्तराखंडी इंटरनेट के माध्यम से इस सांस्कृतिक उत्सव से जुड़ सके।
इस पूरे सफर का सार क्या है?
इसका सार हमारी टैगलाइन “अपणी भाषा, अपणु रिवाज” में छिपा है। यह केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी की खुशबू को बचाए रखने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की एक सफल कोशिश है।
