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कलेजे के टुकड़ों को बेच रहे हैं लोग

मनमोहन सिंह

घोर प्रांत, अफगानिस्तान।
एक जर्जर मिट्टी के घर का अंदरूनी हिस्सा। शाम का धुंधलका। मिट्टी का चूल्हा बुझा हुआ है, जिस पर राख जमी है। कोने में एक फटे हुए कंबल में लिपटी दो बच्चियां भूख से बेहाल, निढाल लेटी हैं। अब्दुल कमरे के बीचों-बीच सिर पर हाथ रखे बैठे हैं, उनकी आंखों में बेबसी और गुस्सा साफ दिख रहा है। उनकी पत्नी जेबा रसोई के खाली बर्तनों को टटोल रही हैं, जिनमें अनाज का एक दाना भी नहीं है।
अब्दुल राशिद अजीमी (धीमी, भारी और कांपती आवाज में, खिड़की से बाहर देखते हुए)
‘कल सूरज निकलने से पहले मुझे कोई पैâसला करना होगा, जेबा… अगर इन्हें जिंदा देखना है, तो इन्हें खुद से दूर करना ही होगा। मुझसे इनका यह तड़पना और नहीं देखा जाता।’
जेबा (आंखों में आंसू लिए, रुआंसे और भरे हुए गले से शौहर के करीब आते हुए)’ अब्दुल, अपनी ही कोख के टुकड़ों का सौदा? कोई बाप ऐसा ़वैâसे सोच सकता है? हमारी नूर और मरियम… अभी सिर्फ सात साल की तो हैं वो!’
अब्दुल राशिद अजीमी (अचानक खड़े होते हुए, चीखते हुए लेकिन आवाज में रोना दबाए) ‘तो और क्या करूं मैं? बताओ मुझे! हफ्तों से इस घर में चूल्हा नहीं जला है। बाहर सड़कों पर काम की भीख मांगता हूं, तो लोग दुत्कार देते हैं। क्या इन्हें अपनी आंखों के सामने भूख से दम तोड़ते देखूं? बेचना मेरी ख्वाहिश नहीं, इन मासूमों को जिंदा रखने का मेरा आखिरी और इकलौता जरिया है!’
जेबा (दीवार के सहारे टूटकर बैठ जाती हैं, अपनी फटी हुई चादर के कोने से आंसू पोंछते हुए) ‘खुदा वैâसा इम्तिहान ले रहा है हमारा… कई बार पूरा परिवार केवल सूखी रोटी और गर्म पानी पीकर सो जाता है। पर अब तो वो सूखी रोटी भी नसीब नहीं…’
अब्दुल के आंसू उनकी दाढ़ी पर गिर रहे हैं…
यह कोई काल्पनिक दृश्य नहीं, बल्कि आज के अफगानिस्तान की वो खौफनाक और कड़वी हकीकत है, जिसे देखकर इंसानियत भी शर्मसार हो जाए। घोर प्रांत के ग्रामीण इलाकों में गरीबी और भुखमरी इस कदर हावी हो चुकी है कि अब्दुल राशिद अजीमी जैसे सैकड़ों लाचार पिता आज अपनी ही मासूम औलादों को बेचने के कगार पर खड़े हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, देश की १० प्रतिशत से अधिक आबादी यानी लगभग ४७ लाख लोग भुखमरी के बेहद करीब पहुंच चुके हैं।
ग्रामीण अंचलों में हालात बदतर हैं। अब्दुल राशिद का परिवार पिछले कई हफ्तों से दाने-दाने को तरस रहा है। जब घर में कुछ नहीं होता, तो बच्चों का पेट भरने के लिए केवल गर्म पानी में सूखी रोटी के टुकड़े डालकर दे दिए जाते हैं, ताकि वे किसी तरह रात काट सकें। लेकिन अब वह सूखी रोटी भी खत्म हो चुकी है, जिसके बाद इस परिवार के पास अपनी सात वर्षीय जुड़वां बेटियों का सौदा करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।
कटौती से तबाही
इस भयावह मानवीय संकट के पीछे अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी की बेरुखी सबसे बड़ा कारण है। अमेरिका और अन्य देशों द्वारा मानवीय और आर्थिक सहायता में की गई भारी कटौती ने जमीनी स्तर पर तबाही मचा दी है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इस वर्ष विदेशी सहायता में बीते वर्ष की तुलना में करीब ७० प्रतिशत की कमी आई है। रोजगार पूरी तरह ठप हैं, बेकरियों के बाहर बासी रोटी के लिए दंगे जैसे हालात हैं और अस्पतालों के कुपोषण वार्ड दम तोड़ते बच्चों से पटे पड़े हैं।
अफगानिस्तान की यह जमीनी रिपोर्ट चीख-चीखकर दुनिया से सवाल कर रही है कि क्या राजनीतिक कड़वाहटों की कीमत मासूम बच्चों को अपनी जिंदगी और बचपन बेचकर चुकानी पड़ेगी?
इलाज के लिए भी बिक रहे बच्चे
यह त्रासदी सिर्फ अब्दुल के घर तक सीमित नहीं है। इसी प्रांत के एक अन्य पिता, सईद अहमद ने अपनी पांच साल की बीमार बेटी शाइका के अपेंडिक्स और लीवर के इलाज का खर्च उठाने के लिए उसे अपने ही एक रिश्तेदार को दो लाख अफगानी में बेच दिया। समझौता यह हुआ है कि पांच साल बाद, जब बच्ची थोड़ी बड़ी हो जाएगी, उसे हमेशा के लिए खरीददार के हवाले कर दिया जाएगा।

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