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बीसीसीआई की जवाबदेही खत्म!..खेल मंत्रालय ने उड़ाई कानून की ‘गिल्लियां’… ‘क्रोनोलॉजी’ समझिए!

– आरटीआई एक्ट के दायरे से बाहर है

– अपने ही फैसले से पलटा सीआईसी

सामना संवाददाता / मुंबई

क्रिकेट के ‘मालिक’ और पैसे के सुल्तान, दोनों जब हाथ मिला लें तो अच्छे-अच्छे कानूनों की गिल्लियां उड़ जाती हैं। आज हम देश के सबसे बड़े खेल, सबसे अमीर बोर्ड और उस गुप्त ‘ऑपरेशन’ का पर्दाफाश करने जा रहे हैं, जिसने दुनिया के सबसे रसूखदार क्रिकेट संगठन बीसीसीआई को आम जनता की नजरों से हमेशा-हमेशा के लिए छिपा दिया है। केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) का ताजा पैâसला तो सिर्फ एक मोहरा है, असली बिसात तो साल २०२५ की तपती गर्मियों में ही बिछाई जा चुकी थी। कहानी की शुरुआत होती है अगस्त २०२५ से। बीसीसीआई के बंद कमरों में पसीना बह रहा था। डर था कि अगर आरटीआई का शिकंजा पूरी तरह कस गया तो आईपीएल के गुप्त सौदे, खिलाड़ियों के चयन के पीछे का खेल, टैक्स की फाइलें और अरबों रुपयों के लेन-देन का कच्चा चिट्ठा चौराहे पर आ जाएगा।
खेल मंत्रालय ने…
तभी एंट्री होती है खेल मंत्रालय की। मंत्रालय ने वो किया जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक की फाइलों को खोला गया और उसमें चुपके से एक ऐसा जादुई संशोधन डाल दिया गया, जिसने कानून की रीढ़ ही तोड़ दी।
इस नए बदलाव के तहत साफ कर दिया गया कि अब से आरटीआई के दायरे में केवल वही खेल संस्थाएं आएंगी, जो सरकार से अनुदान लेती हैं या पूरी तरह सरकारी खजाने पर निर्भर हैं। यह कोई सामान्य बदलाव नहीं था, यह बीसीसीआई को बचाने के लिए तैयार किया गया एक कस्टमाइज्ड सुरक्षा कवच था।
बीसीसीआई के पास इतना पैसा है कि वह कई देशों को उधार दे दे। इसी पैसे को बोर्ड ने अपनी सबसे बड़ी ढाल बना लिया। बोर्ड के वकीलों ने सीआईसी के सामने सीना तानकर कहा कि हम सरकार से एक धेला नहीं लेते। स्टेडियम हमारा, खिलाड़ी हमारे, आईपीएल हमारा और पैसा भी हमारा। जब हम सरकारी खजाने से मदद नहीं ले रहे, तो हम जनता को हिसाब क्यों दें? लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या सरकारी जमीन, टैक्स में मिलने वाली छूट, पुलिस सुरक्षा और देश के नाम यानी ‘टीम इंडिया’ का इस्तेमाल करना सरकारी मदद नहीं है? इस सवाल को कानून की भारी-भरकम फाइलों के नीचे दबा दिया गया।
याद करिए साल २०१८ को, जब तत्कालीन सूचना आयुक्त एम. श्रीधर आचार्युलु ने एक ऐतिहासिक पैâसला सुनाते हुए बीसीसीआई को पब्लिक अथॉरिटी घोषित किया था। उस वक्त लगा था कि अब क्रिकेट के साम्राज्य में पारदर्शिता आएगी। लेकिन सत्ता और पैसे के गलियारों में यह बात खटक रही थी। साल २०२५ में कानून बदला गया और अब २०२६ में आकर सीआईसी ने अपने ही पुराने पैâसले को पलटते हुए बीसीसीआई को क्लीन चिट दे दी।
बड़ा सवाल: जनता से क्या छुपाना चाहता है बोर्ड?
इस सनसनीखेज घटनाक्रम ने साबित कर दिया है कि जब बात बीसीसीआई की आती है तो नियम बदल दिए जाते हैं, कानून मोड़ दिए जाते हैं। आज बीसीसीआई, आरटीआई के शिकंजे से पूरी तरह आजाद हो चुका है। अब न तो कोई आम नागरिक यह पूछ सकता है कि टिकटों की कालाबाजारी वैâसे हुई, न कोई यह जान सकता है कि डोपिंग के मामलों में किस खिलाड़ी को क्यों बचाया गया, और न ही कोई चयनकर्ताओं के पैâसलों पर आरटीआई डाल सकता है। साफ है कि क्रिकेट अब सिर्फ खेल नहीं, एक ऐसा प्राइवेट लिमिटेड किला बन चुका है, जिसके अंदर झांकने की इजाजत किसी को नहीं है। खेल मंत्रालय ने गेम ऐसा घुमाया कि बीसीसीआई नॉट आउट रहा और देश की जनता क्लीन बोल्ड हो गई।

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