मेरे हाथ में एक पुरानी लोहे की चाबी है,
पीले पड़ गए कपड़े के रुमाल से बंधी हुई।
आज मैं अपना पुश्तैनी घर देखने आया हूं,
पिता से किया एक वादा निभा रहा हूं।
हर माह चाहे मत जाना, परन्तु
छमाही या वर्ष में एक बार घर को खोल लेना।
बड़ा सा एक देसी ताला लगा हुआ है,
जिसे खोलने का प्रयास देर से कर रहा हूं।
लोहे की सांकल खोल, धकियाते हुए
काठ का किवाड़ खोल लिया है।
भभका एक बंद कमरे की हवा का
मेरे से टकराया। बड़ी कठिनाई से मैंने अपने को बचाया।
सब पर धूल-मिट्टी की परत चढ़ी हुई है।
कभी हवा के झोंके से खिड़की खुल गई,
तभी हर जगह धूल-मिट्टी पड़ी हुई है।
एक कमरे के टूटे वातायन से राह पाकर
कपोत-युगल ने बसेरा अपना बनाया था।
बाहर नीम के पेड़ की छांव घनी हो गई थी,
उग गई झाड़ियां, घास बड़ी हो रही थी।
आम के पेड़ पर डले झूले के
एक सिरे की बोदी हुई रस्सी धरा पर पड़ी थी,
जिसे दीमक मजे से चाट रही थी।
देख लिया पड़ोसी बूढ़े काका ने,
पूछ लिया, “बबुआ, कब आए हो?
चाय पी, कुछ सुस्ता लो, कुछ अपनी थकान मिटा लो।”
हाथ जोड़ नमस्कार कर मैं फिर कमरे में आया।
बल्ब कमरे का नहीं जल रहा था,
तार बिजली का हवा में लटक रहा था।
लोहे के संदूक मुझे चिढ़ा रहे थे,
“अब के भी हमें नहीं खोल पाओगे?”
अनाज रखने का एक ड्रम खुला हुआ was,
चौखट अलमारी की गिरने ही वाली थी।
अंदर धरी कागज-पत्री मिट्टी हो गई थी।
एक टूटी साइकिल कोने में सजी थी,
जिस पर मैं भी बचपन में चढ़ा था।
दूसरे कोने में सरिये की तिपाई थी,
जिस पर सजी मिट्टी की सुराही थी,
जो किसी तीर्थ यात्रा में मां ने खरीदी थी।
दीवार पर गढ़े खूंटे पर, काले कपड़े वाले
छाते का अस्थिपंजर लटक रहा था।
सूत, निवाड़ बुनी दो चारपाई बिछी थीं,
तो दो दीवार से सटकर खड़ी थीं।
बंधी बोरी से झांकते गिलास, थाल, कटोरे थे,
पीतल की गागर और कांसे के बलटोहे थे।
कन्नी वाली सूती बाबा की धोतियां,
कुछ घिसे हुए कुर्ते थे।
साथ ही मां की पहनी हुई साड़ियां थीं।
एक गमछा मकड़ी के जालों से झांक रहा था।
हां, एक सिलबट्टा और पत्थर की चक्की है,
जिसके दो पाटों में पिसते मानव की स्थिति है।
हां, एक तराजू बांटों सहित पड़ा है, जिसकी
रस्सियां भुरभुरा गई हैं।
यही मेरे पिता की जीवन भर की बहुमूल्य सम्पत्ति थी,
जिसकी चिन्ता उन्हें हमेशा सताती थी।
घर से कुछ दूर कभी एक कूआं था,
जिसके जगत पर मिट्टी के घड़ों के हस्ताक्षर थे।
कुएं का पानी सूख गया था,
लोगों ने घर के कचरे से पाट दिया था।
हम क्यों पुश्तैनी घरों को छोड़ देते हैं?
दरवाजों, झरोखों, ईंटों के टूट कर बिखरने की प्रतीक्षा करते हैं।
समय न होने का बहाना जोड़ देते हैं।
मां और बाबूजी अब नहीं रहे,
उनकी कुछ चीजों को संभाल सकते हैं।
दो जोड़ी आंखें कहीं से देख रही होंगी,
प्रत्यक्ष न होते हुए भी आशीर्वाद दे रही होंगी।
— बेला विरदी
