अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति अब कूटनीति से अधिक दबाव, धमकी और सैन्य प्रदर्शन पर टिकती दिखाई दे रही है। वेनेजुएला, ग्रीनलैंड और ईरान के बाद अब क्यूबा पर अमेरिकी नजरें टिक गई हैं। वैâरेबियन सागर में यूएसएस निमित्ज वैâरियर स्ट्राइक ग्रुप की तैनाती ने यह संदेश साफ कर दिया है कि वॉशिंगटन हवाना पर दबाव बढ़ाने के मूड में है। अमेरिकी दक्षिणी कमान ने इस तैनाती की पुष्टि की है, जबकि कई रिपोर्टों में इसे क्यूबा के खिलाफ बढ़ती अमेरिकी रणनीतिक सख्ती से जोड़ा गया है।
समस्या केवल क्यूबा तक सीमित नहीं है। जब कोई महाशक्ति ‘सत्ता परिवर्तन’ को विदेश नीति का औजार बना लेती है, तो उसका असर सीमाओं से बहुत दूर तक जाता है। क्यूबा पहले ही ऊर्जा संकट, आर्थिक बदहाली और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। ऐसे समय में सैन्य दबाव वहां जनता के जीवन को और कठिन बना सकता है। अमेरिकी प्रशासन ने राउल कास्त्रो के खिलाफ अभियोग और क्यूबा पर राजनीतिक दबाव को तेज किया है, जबकि हवाना इसे राजनीतिक हमला बता रहा है।
ट्रंप की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वे दुनिया को सौदेबाजी की मेज समझते हैं। कहीं प्रतिबंध, कहीं धमकी, कहीं युद्धपोत और कहीं सत्ता पलटने की इच्छा-यह शैली अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को अस्थिर करती है। विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने क्यूबा में बदलाव की जरूरत की बात कही है और ट्रंप प्रशासन ने हवाना के खिलाफ अपनी भाषा कड़ी की है।
क्यूबा पर कोई भी सैन्य कार्रवाई अमेरिका को वैसी ही दलदल में धकेल सकती है, जैसी पश्चिम एशिया में कई बार देखी गई है। छोटे देशों पर दबाव बनाना आसान लगता है, लेकिन वहां की जनता, भूगोल, इतिहास और राष्ट्रवाद किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को लंबी टकराहट में बदल सकते हैं।
दुनिया को आज युद्ध नहीं, स्थिरता चाहिए। तेल, व्यापार, आपूर्ति शृंखला और वैश्विक बाजार पहले ही तनाव में हैं। यदि अमेरिका ने क्यूबा को भी टकराव का मैदान बना दिया, तो कीमत केवल हवाना नहीं, पूरी दुनिया चुकाएगी। ट्रंप की सनक महाशक्ति की ताकत दिखा सकती है, लेकिन यह मानवता को फिर एक नए संकट की ओर भी धकेल सकती है।
अमेरिका की हवाई ताकत को भारी नुकसान
अमेरिका की कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस की हालिया रिपोर्ट ने ईरान के साथ हुए ४० दिनों के युद्ध में अमेरिकी सैन्य क्षमता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस संघर्ष में अमेरिका के ४२ सैन्य विमान नष्ट हुए या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए, जिनमें एफ-३५ स्टील्थ फाइटर, एफ-१५ई, ए-१०, टैंकर विमान, हेलिकॉप्टर और ड्रोन शामिल बताए गए हैं। हालांकि, रिपोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि ये आंकड़े सार्वजनिक सूचनाओं और रक्षा स्रोतों पर आधारित हैं तथा अंतिम संख्या बदल सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका को सबसे ज्यादा नुकसान युद्ध के अंतिम चरण में हुआ, जब ईरान ने अपने सीमित हवाई रक्षा संसाधनों का आक्रामक और रणनीतिक इस्तेमाल किया। इससे यह संदेश गया कि आधुनिक युद्ध में केवल अत्याधुनिक विमान ही निर्णायक नहीं होते, बल्कि जमीन आधारित वायु-रक्षा प्रणाली, ड्रोन-रोधी क्षमता और लक्ष्य-चयन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
एफ-३५ जैसे महंगे और अत्याधुनिक विमान को नुकसान पहुंचना अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठा के लिए प्रतीकात्मक झटका माना जा रहा है। यह रिपोर्ट बताती है कि ईरान भले ही संसाधनों में कमजोर हो, लेकिन उसने अमेरिकी-इजरायली दबाव के सामने अपनी रक्षा रणनीति को प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया।
