-फडणवीस सरकार के दावों की खुली पोल
सुनील ओसवाल / मुंबई
महाराष्ट्र में डीजल संकट अब विस्फोटक रूप लेता जा रहा है। खेत बचाने के लिए किसान पेट्रोल पंपों के बाहर घंटों लाइन में खड़े हैं, लेकिन डीजल पाने के लिए अब उन्हें अपनी जमीन का सबूत यानी ७/१२ (सातबारा) दिखाना पड़ रहा है। परभणी समेत कई जिलों में पेट्रोल पंपों पर खुलेआम बोर्ड लगाए गए हैं — ‘७/१२ दिखाने पर ही डीजल म्िालेगा।’
इसने किसानों के गुस्से को और भड़का दिया है।
एक तरफ मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस कैमरों के सामने दावा कर रहे हैं कि ‘राज्य में पेट्रोल-डीजल का भरपूर स्टॉक है’, वहीं दूसरी तरफ गांव-गांव में ‘नो स्टॉक’ के बोर्ड लटकते नजर आ रहे हैं। किसान सवाल पूछ रहे हैं। ‘अगर डीजल भरपूर है, तो फिर पंप सूखे क्यों पड़े हैं?’
खेती के सीजन के बीच डीजल संकट ने किसानों की कमर तोड़ दी है। ट्रैक्टर बंद पड़े हैं, सिंचाई के पंप रुक रहे हैं और किसान सुबह से कैन लेकर पेट्रोल पंपों के बाहर धक्के खा रहे हैं। कई किसानों का आरोप है कि सातबारा दिखाने के बाद भी उन्हें जरूरत भर डीजल नहीं दिया जा रहा। ग्रामीण इलाकों में हालात इतने खराब हो चुके हैं कि लोग एक-दूसरे को फोन कर यह पूछ रहे हैं, ‘उनके पंप पर थोड़ा डीजल बचा है?’ कई जगहों पर डीजल के लिए बहस और झड़प की नौबत तक आ गई। किसानों का आरोप है कि सरकार सिर्फ बयानबाजी कर रही है और जमीनी हालात छिपाए जा रहे हैं। पहले कर्जमाफी के नाम पर किसानों को ‘लॉलीपॉप’ दिया गया और अब डीजल के लिए उन्हें अपनी जमीन के कागज दिखाने पड़ रहे हैं।
कृषि मंत्री की सफाई से भी शांत नहीं हुआ गुस्सा
इस पूरे विवाद के बाद कृषि मंत्री दत्तात्रय भरणे को सफाई देनी पड़ी। उन्होंने माना कि ७/१२ मांगना गलत है और जिलाधिकारियों को जांच के आदेश दिए गए हैं। मंत्री ने फिर वही सरकारी दावा दोहराया कि राज्य में ईंधन की कोई कमी नहीं है, बल्कि खपत बढ़ने से भीड़ दिखाई दे रही है। लेकिन किसानों का गुस्सा अब सरकार की सफाई से शांत होता नहीं दिख रहा। ग्रामीण महाराष्ट्र में फडणवीस सरकार के खिलाफ नाराजगी तेजी से बढ़ रही है। किसानों का कहना है कि ‘टीवी पर भाषण देने से खेत नहीं चलते खेतों को डीजल चाहिए!’ डीजल संकट ने अब सरकार के दावों और जमीनी सच्चाई के बीच की खाई को पूरी तरह उजागर कर दिया है।
