श्रीकिशोर शाही
(सत्ता में सुंदरी की घुसपैठ-१९)
‘न्यूज ऑफ द वर्ल्ड’ के खुलासे के बाद ब्रिटिश सरकार में जो भूचाल आया, उसे शांत करने के लिए एक फौरी और निर्मम ‘ऑपरेशन क्लीन-अप’ की सख्त जरूरत थी। मार्गरेट थैचर की सरकार किसी भी कीमत पर एक और ‘प्रोफुमो कांड’ का कलंक अपने माथे पर नहीं लेना चाहती थी। सत्ता के गलियारों में अब बस एक ही मकसद था, जितनी जल्दी हो सके, पामेला बोर्डेस के नाम और उसके साये को ब्रिटिश संसद से पूरी तरह मिटा देना।
सबसे पहला और कड़ा कदम उठाते हुए हाउस ऑफ कॉमन्स ने तुरंत पामेला का वीआईपी ‘सिक्योरिटी पास’ रद्द कर दिया। वह छोटा सा कार्ड, जो पामेला के लिए सत्ता और रसूख का सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र था, एक ही झटके में उससे छीन लिया गया। जिन कंजर्वेटिव सांसदों डेविड शॉ और हेनरी बेलिंघम ने पामेला को अपने यहां रिसर्चर की नौकरी दी थी, वे अब खुद की कुर्सी बचाने के लिए स्पष्टीकरण देते फिर रहे थे। संसद की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर तुरंत एक उच्च स्तरीय जांच बिठा दी गई, ताकि जनता को यह भरोसा दिलाया जा सके कि पामेला की पहुंच किसी भी संवेदनशील और गोपनीय सरकारी दस्तावेज तक नहीं थी।
लेकिन राजनीति और सत्ता का यह खेल जितना चकाचौंध भरा होता है, उतना ही बेरहम भी होता है। पामेला को अब इस क्रूर सच्चाई का सामना करना था। जो ताकतवर राजनेता, मीडिया के िदग्गज और अरबपति कल तक उनकी एक झलक पाने के लिए बेताब रहते थे, आज उन्होंने पामेला को पहचानने से भी साफ इनकार कर दिया। खेल मंत्री कॉलिन मोयनिहान हों या ‘फ्लीट स्ट्रीट’ के बड़े संपादक एंड्रयू नील और डोनाल्ड ट्रेलफोर्ड, सबने रातों-रात पामेला से अपने सारे रिश्ते पूरी तरह तोड़ लिए। किसी ने उसे ‘महज एक परिचित’ बताया तो किसी ने उसके साथ अपने किसी भी तरह के संबंधों को सिरे से नकार दिया।
लंदन की वह हाई-सोसायटी, जिसने कभी पामेला को सिर आंखों पर बिठाया था, अब उसके लिए पूरी तरह अछूत हो चुकी थी। सत्ता ने अपनी साख बचाने के लिए पामेला को एक ‘बलि के बकरे’ की तरह इस्तेमाल किया और फिर दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर फेंक दिया। महल के दरवाजे बंद हो चुके थे। पामेला बोर्डेस अब पूरी तरह अकेली पड़ चुकी थी और इस राजनीतिक किले से बाहर निकलते ही उस पर हमला करने के लिए ब्रिटिश मीडिया का खूंखार झुंड पूरी तरह तैयार खड़ा था।
(शेष अगले अंक में)
