मुख्यपृष्ठस्तंभबेबाकबेबाक : ‘कॉकरोच’, राजनीति के माथे पर बल

बेबाक : ‘कॉकरोच’, राजनीति के माथे पर बल

अनिल तिवारी
मुंबई

भारतीय राजनीति में कभी-कभी कोई नारा, कोई मीम या कोई तंज इतनी तेजी से पैâलता है कि स्थापित दलों की पूरी प्रचार मशीनरी हांफती नजर आने लगती है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ यानी सीजेपी इसी नई डिजिटल राजनीति की ताजा मिसाल है।
सत्ता की आलोचना सहन नहीं!
यह कोई पारंपरिक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि बेरोजगारी, परीक्षा घोटालों, महंगाई और व्यवस्था से नाराज युवाओं का व्यंग्यात्मक डिजिटल आंदोलन है, जिसने कुछ ही दिनों में सोशल मीडिया पर विस्फोटक लोकप्रियता हासिल कर ली। यह आंदोलन बेरोजगार युवाओं को लेकर की गई कथित ‘कॉकरोच’ टिप्पणी की प्रतिक्रिया में शुरू हुआ और देखते ही देखते जेन-जी के गुस्से की आवाज बन गया।
सबसे रोचक बात यह है कि इसका नाम ही इस आंदोलन की राजनीति है। कॉकरोच, जिसे आमतौर पर नापसंद किया जाता है, जिसे कुचलने की कोशिश की जाती है, लेकिन फिर भी वह बचा रहता है। युवाओं ने इसी प्रतीक को अपने पक्ष में मोड़ दिया। संदेश साफ है, आप हमें जितना भी हल्का समझें, हम व्यवस्था की दरारों से फिर बाहर आएंगे। अभिजीत दीपके द्वारा शुरू किए गए इस डिजिटल अभियान ने इंस्टाग्राम पर कुछ ही दिनों में करोड़ों फॉलोअर्स जुटा लिए। शायद भाजपा से भी ज्यादा।
अलबत्ता, मामला तब और दिलचस्प हो गया जब मऊ सदर के विधायक अब्बास अंसारी ने २०२७ के चुनाव को लेकर पूछे गए सवाल पर हंसते हुए कह दिया कि टिकट मिला तो वे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ से भी चुनाव लड़ जाएंगे। अब्बास का यह बयान भले ही आधा मजाक, आधा राजनीतिक संकेत रहा हो, लेकिन देश की राजनीति में उसने हलचल पैदा कर दी। इसी बीच सीजेपी के एक्स हैंडल को भारत में रोके जाने की खबर ने इस मीम-मूवमेंट को और राजनीतिक बना दिया। कांग्रेस सांसद दीपेंद्र हुड्डा ने इसे लेकर भाजपा पर हमला बोलते हुए कहा कि नोटबंदी और वोटबंदी के बाद अब ‘कॉकरोच बंदी’ आ गई है। उनका आरोप था कि यदि कोई सोशल मीडिया पर सत्ता की आलोचना करता है तो उसका अकाउंट बंद करवा दिया जाता है। सीजेपी का एक्स अकाउंट जब भारत में रोक दिया गया है तो विपक्ष ने भी आवाज उठाई।
जब युवा नाराज होता है तो…
विपक्षी नेताओं ने कॉकरोच जनता पार्टी को औपचारिक राजनीतिक दल से अधिक युवाओं की नाराजगी, बेरोजगारी, सोशल मीडिया व्यंग्य और सत्ता-विरोधी डिजिटल प्रतिरोध का प्रतीक बताया। महुआ मोइत्रा और कीर्ति आजाद ने इसे हास्य-व्यंग्य के रूप में अपनाया, अखिलेश यादव ने इसे भाजपा-विरोधी राजनीतिक संकेत में बदला, अब्बास अंसारी ने इसे पूर्वांचल की सियासत में चुटीले बयान के रूप में इस्तेमाल किया तो अर्जुन चौटाला ने युवाओं के अपमान के खिलाफ पहचान बनाई और दीपेंद्र हुड्डा ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बता दिया।
खैर, कॉकरोच जनता पार्टी की असली ताकत उसके हास्य-व्यंग्य में छिपी गंभीरता है, जो किसी न किसी माध्यम से जारी ही रहेगा। यह आंदोलन कहता तो मजाक में है, लेकिन चोट बेरोजगारी, पेपर लीक, महंगाई, अवसरों की कमी और सत्ता से संवादहीनता पर करता है। यही वजह है कि युवा इसे पार्टी से ज्यादा अपनी खीझ का मंच मान रहे हैं। सत्ता इसे मीम समझकर टाल सकती है, विपक्ष इसे अपने पक्ष का गुस्सा मानकर भुना सकता है, लेकिन सच यह है कि सीजेपी ने राजनीतिक दलों को आईना दिखाया है। कॉकरोच जनता पार्टी कभी चुनाव लड़ेगी या नहीं, यह अलग सवाल है। लेकिन उसने यह जरूर सिद्ध कर दिया है कि आज की राजनीति में जनता का व्यंग्य भी वोट जितना शक्तिशाली हो सकता है। जब युवा नाराज होता है तो वह पहले मीम बनाता है, फिर मूवमेंट। और अगर व्यवस्था फिर भी नहीं समझती, तो वही मीम कभी-कभी मतपेटी तक पहुंच जाता है। आम आदमी पार्टी का उदय याद है ना?

अन्य समाचार