मुख्यपृष्ठग्लैमरउस वक्त मैं सिर्फ १० साल का था! -जैकी श्रॉफ

उस वक्त मैं सिर्फ १० साल का था! -जैकी श्रॉफ

-करीब ३०० फिल्मों में १३ भारतीय भाषाओं में अभिनय कर चुके जैकी श्रॉफ आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं, जितने चार दशक पहले थे। फिल्म इंडस्ट्री में ‘जग्गू दादा’ और ‘भिडू’ के नाम से मशहूर जैकी श्रॉफ अपनी सादगी, नेकदिली और दमदार अभिनय के लिए जाने जाते हैं। उनकी आने वाली फिल्मों में ‘द ग्रेट ग्रैंड सुपर हीरो-एलियंस अराइवल’, ‘खेती’, ‘वेलकम टू जंगल’ और बहुप्रतीक्षित ‘किंग’ शामिल हैं। ‘किंग’ में वे शाहरुख खान, दीपिका पादुकोण और अभिषेक बच्चन जैसे सितारों के साथ नजर आएंगे। उनके बेटे टाइगर श्रॉफ भी नई पीढ़ी के बेहद लोकप्रिय सितारे हैं। पेश हैं, जैकी श्रॉफ से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

जैकी, आपने इस फिल्म, द ग्रेट ग्रैंड सुपर हीरो-द एलियंस अराइवल, को क्यों स्वीकार किया?
मनीष सैनी, एक युवा लेकिन प्रतिभाशाली लेखक-निर्देशक हैं, जिन्होंने एक नहीं बल्कि तीन राष्ट्रीय पुरस्कार जीते हैं। जब इतने बुद्धिमान निर्देशक ने मुझे एक ‘सुपरहीरो’ दादा की मुख्य भूमिका दी, तो यह कहना स्वाभाविक है कि उन्होंने कहानी और पटकथा पर गहन विचार किया होगा। मनीष सैनी ने मुझ पर भरोसा किया, उन्होंने अपना विश्वास जताया, इसलिए मैं तैयार हो गया। यह एक प्यारे दादा और उनके शरारती पोते की दिलचस्प कहानी है, जिसमें दादा अपने पोते के लिए सुपरहीरो बन जाते हैं। कहानी बच्चों की भावनाओं के इर्द-गिर्द घूमती है और उन्हें जरूर पसंद आएगी। कई साल पहले ‘बंधन’ की शूटिंग के दौरान एक छोटा लड़का मेरा ऑटोग्राफ लेने आया था। बाद में पता चला कि वही छोटा लड़का आज इस फिल्म का निर्देशक मनीष सैनी है।
आपने दादाजी के किरदार के लिए कैसे तैयारी की?
टाइगर जब बड़ा हो रहा था, तब उसका मेरे पिता के साथ एक प्यारा रिश्ता था। वह अपने दादा की गोद में, उनके प्यार और स्नेह में पला-बढ़ा। मैंने उनके रिश्ते की गहराई और उनके प्यार को करीब से महसूस किया है। इस फिल्म में मैंने अपने पिता को ही सीधे तौर पर पेश किया है कि वे टाइगर के साथ वैâसे व्यवहार करते थे, आदि दादा-दादी के लिए उनके पोते-पोती दूध की मलाई के समान होते हैं। यह एक निर्विवाद सत्य है। मेरे पिता के शब्द, उनकी आदतें, जिस तरह से वे टाइगर को दुलारते थे, सब कुछ आज भी मेरी यादों में ताजा है।
आज के दौर में सुपरहीरो का किरदार निभाना कितना चुनौतीपूर्ण था?
मैं ज्यादा विस्तार से नहीं बताऊंगा, लेकिन मुझे रात ३ बजे चार मंजिला इमारत से लटकने वाला सीन करना था। मुझे डर नहीं लग रहा था, मगर सेट पर मौजूद सभी लोग तनाव में थे। पिछली चोट की वजह से मेरी बाहों की मांसपेशियां खिंची हुई थीं, फिर भी मुझे दोबारा लटकना पड़ा। इस सीन को बड़ी समझदारी से फिल्माया गया। हॉलीवुड के टेक्नीशियन भी आए थे, लेकिन मेरी मांसपेशियों की कोशिकाएं फट गईं, बाद में इलाज कराया गया। सुपरहीरो का कॉस्ट्यूम पहनकर घंटों रहना पड़ता था, यहां तक कि बाथरूम जाना भी मुश्किल था। अभिनय में ऐसी चुनौतियों की कीमत चुकानी ही पड़ती है।
आपके करियर की शुरुआत को ४० साल हो चुके हैं। यह सफर कैसा रहा है?
तुम तो सब जानती हो… अब मैं तुम्हें क्या बताऊं? सब कुछ मक्खन जैसा चिकना नहीं था, भिडू। मेरा जन्म मुंबई के तीन बत्ती वालकेश्वर की एक चॉल में हुआ था। पिता कुकुभाई श्रॉफ ज्योतिषी थे और घर का गुजारा बहुत मुश्किल से चलता था। फिर मेरे बड़े भाई हेमंत की अचानक मौत ने मेरी पूरी भावनात्मक दुनिया को हिला दिया। वह अपने दोस्त को बचाने के लिए समुद्र में गए थे और एक लहर उन्हें बहा ले गई। उस समय मैं सिर्फ १० साल का था। इसके बाद मैंने मॉडलिंग शुरू की, संघर्ष के दिनों में पैसे जोड़कर मोटरसाइकिल खरीदी। एक विज्ञापन शूट के दौरान मेरी मुलाकात देव आनंद से हुई, जिन्होंने मुझे अपनी फिल्म ‘स्वामीदादा’ में काम दिया। बाद में सुभाष घई ने मुझे ‘हीरो’ फिल्म में मौका दिया, जिससे मेरी जिंदगी बदल गई। यह सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा, लेकिन मैं ईश्वर, अपने माता-पिता और दर्शकों का हमेशा आभारी हूं।
क्या आपको डर नहीं लगा कि खलनायक बनने के बाद आप सकारात्मक भूमिकाओं में वापस नहीं लौट पाएंगे?
मैं सच कह रहा हूं, ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ। मेरी पहली फिल्म ‘स्वामीदादा’ थी, जिसमें मैं शक्ति कपूर के शिष्य यानी खलनायक बना। फिर ‘हीरो’ आई, जिसमें मैं पारंपरिक हीरो नहीं था। आगे चलकर ‘मिशन कश्मीर’, ‘१०० डेज’, ‘धूम ३’, जैसी फिल्मों में नकारात्मक भूमिकाएं मिलीं। आने वाली ‘किंग’ में भी मैं खलनायक हूं। मैं सुभाष घई को अपना गुरु मानता हूं, उन्हीं की वजह से यहां तक पहुंचा।

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