श्रीकिशोर शाही
राजनीति के दरवाजे हमेशा के लिए बंद होते ही पामेला बोर्डेस एक ऐसी दुनिया में धकेल दी गई, जो सत्ता के गलियारों से भी ज्यादा क्रूर और निर्दयी थी। यह दुनिया थी ब्रिटिश पैपराजीr और टैब्लॉयड मीडिया की। ‘न्यूज ऑफ द वर्ल्ड’ के उस पहले धमाके के बाद तो मानो पूरे ब्रिटेन की मीडिया को पामेला के रूप में एक ऐसा शिकार मिल गया था, जिसे वे नोच खाने के लिए पूरी तरह बेताब थे। ‘फ्लीट स्ट्रीट’ -लंदन का मीडिया हब- वैसे भी रातों-रात किसी को फर्श से अर्श और अर्श से फर्श पर लाने के लिए कुख्यात था।
पामेला के लंदन स्थित अपार्टमेंट के बाहर पत्रकारों और कैमरामैन की भारी भीड़ चौबीसों घंटे डेरा डाले रहती थी। जैसे ही वह घर से बाहर कदम रखती, अनगिनत कैमरों की चमकती फ्लैश उनकी आंखों को अंधा कर देती थी। हर अखबार, हर मैगजीन बस पामेला से जुड़ी कोई नई और मसालेदार कहानी छापने की होड़ में लगा था। उसका अतीत, उसके पुराने प्रेमी, उसकी जीवनशैली, सब कुछ सरेआम नीलाम किया जा रहा था। कल तक जो मीडिया उसके हुस्न के कसीदे पढ़ता था, आज वही उसे ब्रिटेन की सबसे बड़ी और खतरनाक ‘विलेन’ के रूप में पेश कर रहा था।
इस पूरे मीडिया ट्रायल में सबसे शर्मनाक बात यह थी कि वे सभी रसूखदार पुरुष संपादक, मंत्री और सांसद, जिन्होंने पामेला के साथ वक्त गुजारे थे, वे बड़ी ही चालाकी से अपने रसूख का इस्तेमाल कर खुद को मीडिया की नजरों से बचा ले गए। पूरा का पूरा कीचड़ केवल पामेला पर उछाला गया। इस पुरुष-प्रधान सत्ता में पामेला एक बेहद आसान शिकार थी। उसे एक ऐसी ‘कॉल गर्ल जासूस’ के रूप में चित्रित किया गया, जिसने ब्रिटिश लोकतंत्र को पूरी तरह भ्रष्ट कर दिया था।
पामेला अब पूरी तरह से एक खौफनाक चक्रव्यूह में फंस चुकी थी। वह अपने ही घर में एक कैदी बनकर रह गई थी। हर तरफ से होती इस भारी बदनामी, चरित्र हनन और मीडिया के इस दमघोंटू दबाव ने पामेला को मानसिक रूप से तोड़ना शुरू कर दिया था। यह एक ऐसा चंगुल था, जिससे लंदन में रहकर बच पाना बिल्कुल नामुमकिन था। पामेला समझ चुकी थी कि अगर उसे खुद को बचाना है, तो उसे रातों-रात यह देश छोड़ना ही होगा।
(शेष अगले अंक में)
