मुख्यपृष्ठस्तंभकाहें बिसरा गांव: ददा और मितई की साइकिल

काहें बिसरा गांव: ददा और मितई की साइकिल

पंकज तिवारी

‘चलै के चाही साइकिल, खाइके पिसान
खुश बिहान रखिहऽ, इहे बा मोर अरमान
खुश बिहान रखिहऽ,
राखि लिहऽ लाज भगवान,
खुश बिहान रखिहऽ..’
झूलन ददा यही गीत गाते हुए भैंस चराने निकल गए थे। कान्हे पे लाठी धरे धोती और संडो बनियान पहिने अपने ही धुन में रमें आगे बढ़े चले जा रहे थे कि सामने से साइकिल लिहे मितई पांडे भागे चले आ रहे थे। पांडे की उम्र महज बीस-बाइस बरिस ही रही होगी पर किसी का भी मजा लेने में या बात करने में वो खुद को सभी का बाप ही समझते थे। उनको लगता था कि हमसे बीस कोई भी नहीं है, एक मैं ही हूं जो श्रेष्ठ है बाकी सब तो बातें शेष है।
पांडे दिमाग के साथ-साथ ही साइकिल भी बढ़िया चला लेते थे और यही कारण था कि खेती-बाड़ी में भी वो साइकिल का ही अधिक प्रयोग किया करते थे। धान, गेहूं, अरहर या कोई भी बोझा रहा हो वो हमेशा से साइकिल पर ही ढोते रहे थे। एक हाथ से साइकिल चलाते तो दूसरे हाथ से अपने सिर पर रखे बोझ को संभालते थे। पांडे सिद्धहस्त साइकिल चालक थे पर आज तो अनर्थ ही हो गया था। खेते अउर मेड़े पर साइकिल चलाते हुए वो घर के तरफ ही आ रहे थे, खेत देखने आए थे शायद या फिर कोई और कारण रहा होगा पता नहीं। खैर कारण कुछ भी रहा हो पर ददा को गाते देख उनसे रहा नहीं गया और वो लगे साइकिल पर ही इधर-उधर मटकने। मटकते हुए ही पूछ बैठे-
‘का हो ददा इ हमार साइकिलिया देखिके अइसन गावथयऽ काऽ? कुछु जादइ मूड़ में देखाथयऽ। का भऽ कुछ मिलि गवा बा काऽ? कि लाटरी ओटरी लग गइ बाऽ हो ददा? कि कुल झार हमरे सइकिलिए ल बाऽ’ एकदम पतला मेड़ ऊपर से कुछ ज्यादा ही फुदकने लगे मितई।
बेचारी साइकिल भी अचानक से हुए इस बदलाव से घबरा उठी कि ‘अरे! इ पांडे के अचानक से का भइल होऽ..? पागल-वागल तो नहीं हो गया है ई..? घबरा उठी बेचारी साइकिल और मटक के डर के मारे लटकने लगी।
‘धत् राजूऽ.. तोहंऊऽऽऽ..’ ददा अपनी बात पूरी भी नहीं कर सके थे कि- धम्म.. मेड़ से सीधे खेत में आ गिरे मितई..। साइकिल लुढ़क गई एक तरफ। भरभरा कर ढहा गए पांडे, भहरा पड़े नीचे। दूऽर.. थोड़ी दूर पर आम के पेड़ के नीचे अराम से छहां रही करियई कुकुरिया अचानक से हुए इस घटनाक्रम की वजह से घबरा उठी। पहले तो पूंछ झाड़ते और ह्हूंऽऽ करते हुए डर के मारे पीछे की तरफ भागी पर अगले ही पल झउहां कर पांडे की तरफ टूट पड़ी। ई तो भला हो झूलन ददा का कि लाठी लिए दौड़ा लिए। जान बची लाखों पाए। बेचारे पांडे, सारी मस्ती, मटरगस्ती साइकिल के नीचे जा दबी और कराह उठी। बेचारे पांडे अब बोलें भी तो क्या बोलें.. बस निरीह नजरों से निहारते रहे ददा को।
ह्..ह्..ह्हाऽ…- जोर से हंस पड़े ददा।
‘लऽ अउर मजा लऽ हमार। तोहरे सभेन नयके लड़िकयेन में न इहइ कमी बाऽ। के कहइ बूढ़ -पुरनिया मनई देखि के जयरमी अउर पैलगी करै के चाहइ त लागथऽ पहिले खींसइ बनवइ..। देख्यऽ देइ दिहेन भगवान तोहंइ तोफा नऽ..’
फिर हंसने लगे ददा जोर-जोर से।
बेचारु पांडे मुंह बना के तुरंत ही उठना चाहे। झटके में आधा खड़े भी हो गए पर ये क्या धड़ाम! फिर से बैठ गए मितई। चीख जोर से निकल पड़ी। कराह आह के रूप में जीभ से छटक कर बाहर जा गिरी। मितई परेशान हो उठे‌‌। परेशान तो अब ददा भी हो गए। ‘अरे मितइया तोरे त चोट जादा लग गइ बाऽ रेऽ। रुक-रुक हम कुछ करिथऽ। कहते हुए दौड़ पड़े ददा।
क्रमश:
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं

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