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संपादकीय :  वकील चोर हैं क्या?

मुवक्किलों को ‘बरी’ कराने के लिए कई बार वकीलों को सच को झूठ और झूठ को सच बनाना पड़ता है, ऐसा कहा जाता है। लेकिन देश के ज्यादातर वकीलों की ‘डिग्रियां’ झूठी हैं, ऐसा दावा बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन मिश्रा ने किया है, जो चौंकाने वाला है। यह एक प्रतिष्ठित वकालत के पेशे पर एक तरह से कीचड़ उछालना है। ३० से ४० प्रतिशत वकीलों की डिग्रियां झूठी, फर्जी हैं, ऐसा बार काउंसिल के अध्यक्ष किस आधार पर कहते हैं? मिश्रा को अपने ही पेशे के ‘वकीलों’ के व्यावसायिक नैतिक मूल्यों पर शंका हो, यह आश्चर्य की बात है। मनन मिश्रा सिर्फ वकील या बार काउंसिल के अध्यक्ष नहीं हैं, बल्कि वे प्रधानमंत्री मोदी के भक्त और भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं। इसलिए वकीलों के बारे में उनकी राय भाजपा या मोदी परिवार की राय हो सकती है। मिश्रा से करीब एक महीने पहले फर्जी कानून की डिग्रियों को लेकर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट में फटकार लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत एक याचिकाकर्ता वकील पर भड़क गए और बोले, ‘‘दिल्ली के कई वकीलों की डिग्रियां असली हैं या नहीं, इस बारे में मुझे गंभीर शंका है। कुछ वकीलों की सोशल मीडिया गतिविधियां देखकर लगता है कि उनकी डिग्रियां फर्जी हो सकती हैं। सीबीआई को इसकी जांच करनी चाहिए।’’ मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के बयान के समर्थन में ३०-४० प्रतिशत वकीलों की डिग्रियां फर्जी होने की बात मनन मिश्रा ने सार्वजनिक की। ऐसे कई वकील ‘संघ’ की कृपा से न्याय के क्षेत्र में घुस गए हैं, यह बात मनन मिश्रा को पता होनी चाहिए। ऐसे वकील बड़ी संख्या में
भाजपा और संघ के ही आश्रय में
हैं और सरकारी वकील, मजिस्ट्रेट, न्यायाधीशों के सर्वोच्च श्रेणी में उनकी नियुक्तियां हुई हैं। प्रधानमंत्री मोदी, कुछ केंद्रीय मंत्रियों द्वारा दिखाई गई ‘डिग्रियां’ झूठी हैं, इसके सबूत देने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री मोदी, केंद्रीय मंत्री ईरानी की झूठी डिग्रियों के मामले नहीं सुने। अगर वकीलों की डिग्रियां झूठी होने पर किसी को चिंता हो रही है तो प्रधानमंत्री, मंत्री, मुख्यमंत्री, भाजपा के सांसद वगैरह की झूठी डिग्रियों की ‘पूजा’ यही लोग क्यों कर रहे हैं? मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत न्यायासन पर बैठकर इन दिनों चिड़-चिड़ कर रहे हैं। उसमें वे कभी युवाओं को ‘कॉकरोच’ कहते हैं, तो कभी शिवसेना की सुनवाई पर वकीलों को डांटते हैं। न्यायदेवी का चक्र कीचड़ में फंसा होने का यह लक्षण है और उस पर भारत के सुप्रीम कोर्ट की बार काउंसिल चुप है। सर्वोच्च न्यायालय सहित देशभर में लाखों मुकदमे अटके पड़े हैं। लोग सालों से न्याय की प्रतीक्षा में हैं। न्याय व्यवस्था में ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार बढ़ा है। न्याय खरीदा जाता है या राजनीतिक दबाव में नकारा जाता है, यह आज भारत की स्थिति है। फर्जी वकालत की डिग्रियों को छोड़िए, केंद्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं का ‘पेपर लीक’ मामला गंभीर है। उस पर बार काउंसिल के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कभी कुछ कहा हो, ऐसा नहीं दिखता। मनन मिश्रा ने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ एडवोकेट दुष्यंत दवे का नाम सुना ही होगा। एड. दवे न्यायदान को लेकर चिंता जताते हुए कहते हैं, ‘‘मोदी के प्रधानमंत्री के रूप में पदभार संभालने के बाद से कार्यभार संभालने वाले हर मुख्य न्यायाधीश न्याय देने और न्याय व्यवस्था को ही न्याय देने में असफल रहे हैं। एक के बाद एक उन्होंने मोदी के प्रभाव (दबाव) में सैकड़ों मामलों में समझौता किया है। आज भारत में कानून का राज पूरी तरह से ध्वस्त हो गया है, इसके लिए
मौजूदा न्याय व्यवस्था ही
एकमात्र सबसे ज्यादा जिम्मेदार है।’’ इस पर मिश्रा का क्या कहना है? भारतीय न्याय व्यवस्था के स्वतंत्र इतिहास में अच्छे वकीलों का योगदान है और जब अच्छे वकील न्यायदान में आए तो उन्होंने बेहतरीन काम किया है, लेकिन मनन मिश्रा के मुताबिक ३०-४० प्रतिशत वकीलों की डिग्रियां फर्जी हैं। अगर ऐसा है तो पहले न्यायमूर्तियों की डिग्रियां असली हैं या नकली, यहीं से जांच शुरू करनी चाहिए। भारत में कानून का राज होने के भाषण प्रधानमंत्री मोदी देश-विदेश में देते रहते हैं, लेकिन जिस देश में ३०-४० प्रतिशत वकीलों की डिग्रियां झूठी ठहराई जाती हैं, उस देश में कानून का राज चल रहा है, यह कैसे माना जाए? भाजपा के सांसद मनन मिश्रा ने एक गंभीर विषय को छेड़ा है और वकीलों के पेशे पर कीचड़ उछाला है। देश के वकीलों को बार काउंसिल के अध्यक्ष को जवाब देना चाहिए और उनकी भी ‘वकालत’ की डिग्री की जांच कराने की मांग करनी चाहिए। भारत में प्रधानमंत्री-मंत्रियों से लेकर संसद सदस्यों तक झूठी डिग्रियों का खेल शुरू हो गया है। शिक्षा क्षेत्र का इतना पतन कभी नहीं हुआ था। भाजपा के प्रवक्ताओं को, भ्रष्टाचार के आरोपियों को न्याय की कुर्सी पर बैठाकर मनचाहे ‘फैसले’ लेने हैं। सभी संवैधानिक संस्थाओं के पर काटने हैं। प्रतियोगी परीक्षा, डिग्रियों का ‘चोर बाजार’ लगाना, लेकिन इन सब चोरों को अभय देकर सिर्फ वकीलों को ही ‘चोर’ ठहराना, यही फिलहाल मोदी राज में चल रहा है। भारत के बार काउंसिल के अध्यक्ष मोदी भक्त बनने से ही राज्यसभा पहुंचे हैं। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई भी मोदी की कृपा से राज्यसभा में आए और गए। सेवानिवृत्ति के बाद की ‘सुविधाओं’ के लिए न्याय व्यवस्था का पूरा पतन हो गया है। भारत सरकार की डिग्री ही झूठी है!

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