डॉ. मंगलेश्वर त्रिपाठी / उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश में पंचायतों का कार्यकाल पूरा होने के बाद भी चुनाव न कराना और निवर्तमान प्रधानों को प्रशासक बना देना सरकार की प्रशासनिक नाकामी और लोकतंत्र के प्रति उदासीनता को दर्शाता है।
73वें संविधान संशोधन ने पंचायतों को स्वशासन की इकाई माना है। पांच साल बाद नए सिरे से जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का आना जरूरी है। चुनाव टालकर सरकार ने गांव की सरकार जनता से छीनकर ब्यूरोक्रेसी और पुराने प्रधानों के हवाले कर दी है। यह ग्रामीण लोकतंत्र की हत्या है।
बिना नए जनादेश के प्रधानों को प्रशासक बनाना ‘बैकडोर एंट्री’ जैसा है। प्रशासक के पास न नैतिक बल होता है और न ही जनता के प्रति जवाबदेही। इसका नतीजा भ्रष्टाचार, मनमानी और योजनाओं के ठप होने के रूप में सामने आता है।
सरकार हर बार परिसीमन या मतदाता सूची का बहाना बनाती है। सवाल यह है कि 60 महीने तैयारी के लिए कम थे क्या? यह सीधी प्रशासनिक अक्षमता है।
प्रशासक राज में नए काम रुक जाते हैं। ग्राम निधि खर्च नहीं हो पाती। आवास, मनरेगा और स्वच्छ भारत जैसी योजनाएं धीमी पड़ जाती हैं। नुकसान
गरीब ग्रामीण का होता है, जिसके नाम पर वोट मांगे जाते हैं।
असल में हार के डर या कमजोर संगठन के चलते चुनाव टाले जाते हैं। अपने लोगों को प्रशासक बनाकर सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया जाता है।
पंचायतें लोकतंत्र की नर्सरी हैं। वहां चुनाव टालना लोकतंत्र की जड़ काटने जैसा है। प्रशासक नहीं, बल्कि जनता द्वारा चुना गया प्रधान ही गांव का वास्तविक हकदार है। समय पर चुनाव के बिना ‘ग्राम स्वराज’ सिर्फ भाषण बनकर रह जाएगा।
लोकतंत्र में देरी भी अन्याय है। यह अन्याय आज यूपी के 58 हजार से ज्यादा गांव भुगत रहे हैं।
