सोच यही बस सब्र कर, मत कर मन संताप।
सबको सब कुछ ना मिला, यही जगत का जाप।।
अपनी-अपनी किस्मतें, अपने-अपने माप।
किसी भाग में फूल हैं, किसी भाग में श्राप।
जीवन के इस खेल का, अलग-अलग आलाप—
सबको सब कुछ ना मिला, यही जगत का जाप।।
जिसको दौलत मिल गई, फिर भी मन में ताप।
कोई सूखी रोटियां, खाकर झूमें आप।
चेहरों पर मुस्कान है, भीतर है अभिशाप—
सबको सब कुछ ना मिला, यही जगत का जाप।।
कोई करता रात-दिन, भाग्य रूठा विलाप।
कोई झूठे गर्व में, करता व्यर्थ प्रलाप।
सुख-दुख की इस धूप का, ना संभव है नाप—
सबको सब कुछ ना मिला, यही जगत का जाप।।
कर्मों की हर एक पर, पड़ती जग में छाप।
पापों की दीवार पर, चढ़ता दुख का ताप।
‘सौरभ’ प्रेम और धैर्य ही, जीवन का प्रताप—
सबको सब कुछ ना मिला, यही जगत का जाप।।
-डॉ. सत्यवान सौरभ
