नेह भरे संवाद अब, हुए सभी कंगाल,
मोबाइल की रोशनी, निगल गई हर हाल।।
बैठे-बैठे साथ में, मन फिर भी हैं दूर,
आंखों में स्क्रीन है, रिश्ते चकनाचूर।
चुप्पी ने घर कर लिया, सूना हर चौपाल—
मोबाइल की रोशनी, निगल गई हर हाल।।
दादी वाली सीख अब, सुनता कौन विचार,
सिमट गया है चैट में, अपनापन का प्यार।
भावों के आंगन हुए, जैसे कोई जाल—
मोबाइल की रोशनी, निगल गई हर हाल।।
पहले चिट्ठी में बसा, मन का सारा नेह,
आज इमोजी बोलते, सूख गए सब मेह।
कहने को नाते बचे, फीके पड़े सवाल—
मोबाइल की रोशनी, निगल गई हर हाल।।
बच्चे खेलें कम मगर, स्क्रीनें देखें रोज,
हंसी खिलौनों की गई, मन से सारी खोज।
आंगन की किलकारियां, खोती रोज उछाल—
मोबाइल की रोशनी, निगल गई हर हाल।।
थोड़ा समय निकालकर, बैठो अपने संग,
रिश्तों की इस बाग में, भरो प्रेम के रंग।
मन से मन जुड़ते तभी, मिट जाए हर चाल—
मोबाइल की रोशनी, निगल गई हर हाल।।
-डॉ. सत्यवान सौरभ
