सुरक्षा एजेंसियों के सामने नया खतरा गोपनीय नंबरों से फिरौती कॉल तक
उत्तर प्रदेश में सुरक्षा एजेंसियों की हालिया कार्रवाई ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आतंक, अंडरवर्ल्ड और डिजिटल सूचनाओं की चोरी का नेटवर्क अब किस हद तक व्यक्तिगत और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा बनता जा रहा है। गाजियाबाद के रहने वाले जैद खान की गिरफ्तारी ने इस आशंका को और गंभीर कर दिया है। आरोप है कि जैद ने उत्तर प्रदेश सहित कई जनप्रतिनिधियों के गोपनीय मोबाइल नंबर जुटाकर उन्हें पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और आतंकियों तक पहुंचाया। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है और उससे पूछताछ के आधार पर आगे की कड़ियां तलाश रही है।
जांच एजेंसियों के लिए यह मामला केवल मोबाइल नंबरों की अवैध उपलब्धता का नहीं है, बल्कि यह संवेदनशील सूचनाओं के दुरुपयोग, टार्गेटेड धमकियों और संभावित आतंकी साजिशों से जुड़ा गंभीर मामला बन गया है। जनप्रतिनिधियों के निजी या गोपनीय संपर्क नंबर यदि शत्रु एजेंसियों या आपराधिक गिरोहों तक पहुंचते हैं, तो इसका इस्तेमाल धमकी, ब्लैकमेल, निगरानी, फर्जी कॉल, डिजिटल जालसाजी और दहशत पैâलाने के लिए किया जा सकता है।
इसी कड़ी में क्रिकेटर रिंकू सिंह को मिली धमकी ने भी सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क किया था। रिंकू सिंह से कथित तौर पर पांच करोड़ रुपए की फिरौती मांगी गई थी। यह मामला तब और गंभीर हो गया, जब बाबा सिद्दीकी की हत्या के बाद उनके बेटे जीशान सिद्दीकी को धमकी भरे फोन आने की जांच में यह खुलासा हुआ कि इसी नेटवर्क ने रिंकू सिंह से भी फिरौती मांगी थी। आरोपियों में मोहम्मद दिलशाद और मोहम्मद नवीद के नाम सामने आए। नवीद को वेस्टइंडीज से हिरासत में लिया गया और बाद में भारत को सौंपा गया। रिंकू सिंह को ५ फरवरी २०२५ की सुबह पहला संदेश भेजा गया था। संदेश की शुरुआत प्रशंसक जैसी भाषा से हुई, लेकिन उसके पीछे कथित रूप से फिरौती का दबाव छिपा था। यह तरीका बताता है कि अपराधी अब सीधे धमकी देने के बजाय पहले भावनात्मक या परिचयात्मक संवाद बनाकर निशाना साधने की कोशिश करते हैं। क्रिकेटर, अभिनेता, राजनेता और कारोबारी अब ऐसे संगठित गिरोहों के आसान लक्ष्य बनते जा रहे हैं, क्योंकि उनकी सार्वजनिक पहचान और निजी संपर्क दोनों अपराधियों के लिए दबाव बनाने का माध्यम बनते हैं और इन तक मोबाइल नंबर हिंदुस्तान में बैठे ‘प्यादे’ पहुंचाते हैं। इसकी पुष्टि कुछ अन्य खुलासे भी करते हैं।
गत दिनों नोएडा से गिरफ्तार तुषार चौहान उर्फ हिजबुल्लाह अली खान और समीर खान ने आरएसएस से जुड़े दफ्तरों की लोकेशन पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई को भेजी थी। आरोप है कि इसके बाद उन्हें इन ठिकानों पर ग्रेनेड से हमला करने के निर्देश मिले थे। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह योजना सुनियोजित तरीके से दहशत पैâलाने के उद्देश्य से तैयार की गई थी। आरोपियों से पूछताछ में पता चला था कि व्यक्तिगत स्तर पर डर पैदा करने और कुछ खास लोगों को निशाना बनाने की योजनाएं अब लगातार बन रही हैं। जांच में यह बात सामने आई थी कि धार्मिक पहचान छोड़ चुके कुछ लोगों को धमकाने और निशाना बनाने की चर्चा थी। इससे संकेत मिलता है कि साजिश का उद्देश्य समाज में भय, असुरक्षा और वैचारिक तनाव पैदा करना भी था।
इन मामलों ने सुरक्षा व्यवस्था के सामने कई गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। पहला सवाल यह है कि जनप्रतिनिधियों, खिलाड़ियों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के निजी नंबर अपराधियों तक वैâसे पहुंच रहे हैं। दूसरा यह कि विदेशों में बैठे अपराधी या आतंकी नेटवर्क भारत के भीतर स्थानीय संपर्कों के जरिए सूचनाएं वैâसे जुटा रहे हैं। तीसरा यह कि क्या डिजिटल सुरक्षा और निजी डेटा संरक्षण को लेकर मौजूदा व्यवस्था पर्याप्त है।
फिलहाल, पुलिस और एटीएस की जांच जारी है। गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के आधार पर नेटवर्क के अन्य सदस्यों, विदेशी संपर्कों और संभावित फंडिंग चैनलों की पड़ताल की जा रही है। लेकिन इन घटनाओं ने साफ कर दिया है कि अब सुरक्षा केवल सीमा, भवन या संवेदनशील ठिकानों की नहीं, बल्कि मोबाइल नंबर, डिजिटल पहचान और निजी सूचनाओं की भी है। आतंक और अपराध का नया चेहरा तकनीक, गोपनीय जानकारी और भय के संगठित इस्तेमाल से बन रहा है। जांच एजेंसियों के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है।
