मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का: दिल्ली की लग्जरी कुर्सी

तड़का: दिल्ली की लग्जरी कुर्सी

कविता श्रीवास्तव

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की लग्जरी कुर्सी पर बैठने की एक तस्वीर इन दिनों खूब चर्चा में है। सोशल मीडिया में इस पर इतनी ट्रोलिंग हुई है कि दिल्ली की राजनीति में एक बार फिर नेताओं की जीवनशैली और सादगी बनाम लग्जरी को लेकर बहस तेज हो गई है। लग्जरी चर्चा के केंद्र में कभी अरविंद केजरीवाल आए थे, पर आज चर्चा में हैं दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता। वायरल हुई एक तस्वीर में वे फिल्म कलाकार राकेश बेदी के साथ मुलाकात में एक अत्याधुनिक मसाज और ‘जीरो ग्रैविटी’ वाली लग्जरी कुर्सी पर बैठी दिखाई दीं। इसके बाद इंटरनेट पर सवालों और प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। हालांकि, राजनीति में यह कोई नया विवाद नहीं है। इससे पहले दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सरकारी आवास, महंगे इंटीरियर, विशेष कुर्सियों और सुविधाओं को लेकर तीखी राजनीतिक बहसें हो चुकी हैं।
इस लग्जरी पर भारतीय जनता पार्टी ने सबसे ज्यादा बवाल मचाया था। अब उनकी पार्टी की मुख्यमंत्री हैं और अब उनकी कुर्सी पर चर्चा शुरु है। संभव है कि गुबार की तरह उठा यह मुद्दा धीरे-धीरे शांत हो जाए। फिर भी जनता के बीच अक्सर यह प्रश्न उठता है कि जनप्रतिनिधियों का जीवन वैâसा होना चाहिए? क्या वे सादगी, संयम और आम नागरिकों के संघर्ष से जुड़े दिखाई दें, या फिर आधुनिक सुविधाओं और लग्जरी जीवनशैली को सामान्य माना जाए? असल बहस केवल एक कुर्सी की नहीं है, बल्कि उस प्रतीक की है जो जनता देखती है। जब राजधानी में पानी की कमी, बिजली संकट, गर्मी, ट्रैफिक, प्रदूषण और बुनियादी समस्याओं से लोग जूझ रहे हों, तब नेताओं की आलीशान तस्वीरें लोगों को संवेदनशीलता के सवाल पर सोचने को मजबूर करती हैं। क्योंकि अंतत: सरकारी सुविधाओं का खर्च जनता के टैक्स से ही चलता है। लोकतंत्र में जनता केवल काम ही नहीं देखती, बल्कि नेतृत्व की जीवनशैली, व्यवहार और संवेदनशीलता को भी परखती है। भारत की राजनीति में लंबे समय तक सादगी को नैतिक शक्ति माना गया। लालबहादुर शास्त्री जैसे नेता की सादगी आज भी उदाहरण के रूप में याद की जाती है। वहीं दूसरी ओर आधुनिक राजनीति में सुरक्षा, स्वास्थ्य, कार्यक्षमता और प्रोटोकॉल के नाम पर सुविधाओं का बहुत विस्तार हुआ है। प्रश्न यह नहीं कि कोई नेता आरामदायक कुर्सी पर क्यों बैठा। सवाल यह है कि क्या वह जनता के दर्द और संघर्ष को समझता है? क्या उसकी प्राथमिकताएं जनता की जरूरतों से जुड़ी हैं? क्या वह संकट के समय संवेदनशील दिखाई देता है? लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि केवल शासक नहीं होते, वे जनता के विश्वास के प्रतीक होते हैं। इसलिए नेताओं की सादगी, जवाबदेही और जनसंपर्क हमेशा चर्चा का विषय रहेंगे। जनता चाहती है कि उसका नेता आधुनिक भी हो, सक्षम भी हो, लेकिन जमीन से जुड़ा हुआ भी हो। वह जिन विषयों का विरोधी रहा है उन्हें सत्ता मिलने पर भूल जाएगा तो मतदाता उनको याद भी दिलाएंगे।

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