मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनानौतपा में जनगणना कर रहे प्रगणक देश के मसीहा हैं।

नौतपा में जनगणना कर रहे प्रगणक देश के मसीहा हैं।

 

गिनती नहीं ये इंसानों की,
ये तो भारत की पहचान है।
हर एक नागरिक इस देश का,
इस माटी की जान है।
जनगणना तो बस एक बहाना है,
पूरे विश्व को अपनी ताकत दिखाना है।

भारतीय जनगणना का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। प्राचीन साहित्य ‘ऋग्वेद’ से ज्ञात होता है कि 800-600 ईसा पूर्व के दौरान किसी न किसी रूप में जनसंख्या गणना के स्थान पर जनगणना की जाती थी। कौटिल्य के अर्थशास्त्र, जो लगभग 321-296 ईसा पूर्व में लिखा गया था जिसमें कराधान के उद्देश्य से राजनीति के एक उपाय के रूप में जनगणना पर जोर दिया गया था। स्वतंत्रता पूर्व 1872 में ब्रिटिश वायसराय लार्ड मेयो के अधीन जनगणना हुई थी। लेकिन भारत की संपूर्ण जनगणना 1881में रिपन के समय हुई थी। उसके बाद हर, 10 वर्ष में जनगणना होती रही है। 1949 के पश्चात भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त द्वारा कराई जाती है। 1951के बाद की सभी जनगणनाएं 1948 की जनगणना अधिनियम के तहत कराई गई। 1948 का भारतीय जनगणना अधिनियम केंद्र सरकार को विशेष तिथि पर जनगणना कराने या अधिसूचित अवधि में अपना डेटा जारी करने के लिए बाध्य नहीं करता है।
अब तक कुल 15 बार जनगणना हो चुकी है। 16 वीं जनगणना 2021में होनी थी। लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण यह नहीं हो सकी थी जो कि 2026 में की जा रही है।जनगणना का मुख्य लाभ यह है कि इसके सटीक आंकड़ों के आधार पर सरकारें सही नीतियां बना सकती हैं । इससे लोगों के लिए बजट आवंटन, कल्याणकारी योजनाओं का लाभ, शिक्षा-स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार और विकास कार्यों का सही दिशा में क्रियान्वयन संभव हो पाता है। जनगणना से पता चलता है कि देश में कितने गरीब, बुजुर्ग, युवा और वंचित लोग हैं। इसी आधार पर सरकारें राशन, आवास, और पेंशन जैसी योजनाएं बनाती हैं।सटीक आंकड़ों से पता चलता है कि किस क्षेत्र में कितने बच्चे हैं (स्कूलों की आवश्यकता) और किन इलाकों में स्वास्थ्य केंद्रों या अस्पतालों की सबसे ज्यादा जरूरत है। जनगणना से ही कंपनियों को यह समझने में मदद मिलती है कि कहाँ नया व्यापार या उद्योग लगाया जाए, जिससे स्थानीय लोगों को ज्यादा रोजगार मिल सके। जनगणना के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों की जनसंख्या के आधार पर ही लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन (सीमा तय करना) होता है, जिससे सभी को उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलता है।यह भारत में पहली डिजिटल जनगणना है जो दो चरणों में आयोजित है -पहला चरण (हाउसलिस्टिंग) का 16मई ,2026 से 14जून,2026 है।दूसरा चरण (जनसंख्या गणना) फरवरी 2027 में होगी।
आज़ाद भारत में पहली बार जनगणना के दौरान आरक्षित वर्ग के आंकड़े एकत्रित किये जा रहे हैं। भारत में होने वाली डिजिटल जनगणना (Digital Census) न केवल डेटा एकत्र करने का पारदर्शी तरीका है, बल्कि इससे सटीक योजनाओं का निर्माण, भ्रष्टाचार में कमी, और आम जनता का समय बचने जैसे कई प्रमुख लाभ प्राप्त होगें।
घर बैठे ‘स्व-गणना’ किसी सरकारी कर्मचारी का इंतज़ार किए बिना ही, वेब पोर्टल के माध्यम से अपने परिवार की जानकारी दर्ज करने की सुविधा सचमुच में प्रशंसनीय है।डेटा सीधा सर्वर पर अपडेट होगा, जिससे रिपोर्ट तैयार करने में वर्षों का समय नहीं लगेगा और त्रुटियों की संभावना लगभग खत्म हो जाएगी।वास्तव में इसकी वजह से ही जब सरकार के पास हर क्षेत्र का सटीक और वास्तविक डेटा होगा, तो गरीब कल्याण योजनाओं, मुफ्त राशन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को सीधे जरूरतमंदों तक पहुँचाना आसान हो जाएगी। पूरी प्रकिया डिजिटल होने की वजह से कागज़ की भारी बचत हो रही है। फलस्वरूप पर्यावरण के लिए यह सुखद है।देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में रह रहें लोग अर्थात मुंबई वासियों (Mumbaikars) के लिए जनगणना में भाग लेने से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कई महत्वपूर्ण लाभ होते हैं। सरकार को पता चलता है कि मुंबई के किस इलाके में कितनी जनसंख्या है। इससे यह तय करने में मदद मिलती है कि कहाँ नए अस्पताल, स्कूल, मेट्रो, बस रूट और पानी के प्लांट बनाने हैं। झुग्गी-झोपड़ियों और भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में रहने वालों के लिए उचित राशन वितरण, बिजली, और स्वच्छता (क्लीनिंग प्रोजेक्ट्स) का बजट जनसंख्या के आधार पर ही तय होता है जब सरकार को सटीक आंकड़ों के जरिए यह पता चलता है कि शहर में किस आयु वर्ग और योग्यता के कितने लोग हैं, तो उसी अनुसार रोजगार और कौशल विकास की योजनाएं बनाई जाती हैं।भीषण गर्मी और भारी काम के दबाव के कारण जनगणना (Census) में ड्यूटी कर रहे कई शिक्षक बीमार हुए हैं, और कुछ दुर्भाग्यपूर्ण मौतों की खबरें भी सामने आई हैं। मुंबई और पूरे महाराष्ट्र में इस मुद्दे पर शिक्षकों और सरकार के बीच काफी विवाद और चर्चा रही है, वास्तव में भीषण गर्मी और लगातार फील्ड में काम करने के कारण शिक्षकों के बीमार होने की कई घटनाएं सामने आई हैं। अधिक उम्र और पहले से बीमार (जैसे ब्लड प्रेशर, डायबिटीज) शिक्षकों की तबीयत खराब होने की शिकायतें ज्यादा हैं।महाराष्ट्र के सांगोला और अकोला जैसे इलाकों में जनगणना का कार्य करते समय शिक्षकों को दिल का दौरा (हार्ट अटैक) पड़ने और सड़क दुर्घटना में जान गंवाने की घटनाएं भी घटी हैं।मुंबई के कुछ शिक्षक भी दुर्घटना के शिकार हुए हैं। इन सभी समस्याओं और शिक्षकों के विरोध को देखते हुए, बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने महाराष्ट्र के निजी गैर-सहायता प्राप्त (Unaided) और अल्पसंख्यक स्कूलों के शिक्षकों तथा गैर-शिक्षण कर्मचारियों को जनगणना कार्यों में लगाने पर अंतरिम रोक(Stay) लगा दी है।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिन निजी शिक्षकों ने जनगणना ड्यूटी पर रिपोर्ट नहीं की है, उनके खिलाफ सरकार कोई भी आपराधिक या अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं कर सकती।लेकिन सरकारी कर्मचारियों विशेष कर जो स्वास्थ्य विभाग, सरकारी स्कूलों से हैं उन्हें कोई छूट नहीं मिली है। स्वास्थ्य विभाग के डॉ., सिस्टर तो मरीज की सेवा के साथ ही प्रगणक के सुपरवाइजर का भी कार्य कर रहे हैं। कुछ लोग ऐसे भी है जो कि जनगणना के नाम पर तुरंत दरवाजा बंद कर लेते हैं। कुछ कहते हैं समय नहीं है। कुछ तो चप्पल मारने से ज्यादा अपमानित करते हैं।कुछ प्रगणक का विडियो बनाने लग जाते हैं ,कुछ परिचय पत्र का फोटो खिंचते है, फिर कहते हैं आप किस विभाग में काम करते हैं उसका परिचय पत्र दिखाओ उसका फोटो खिंचकर स्थानीय नेता को भेजकर सलाह मशवरा करते हैं फिर कहते हैं हमसे पहले जनगणना में इतने सवाल नहीं पूछे जाते थे। गाली गलौज करते हैं ।यहाँ तक कि कुत्तों से कटवा भी देते हैं।ऐसे में ऐसा लग रहा है जैसे प्रगणक के पूर्वजों ने इनसे बहुत बड़ा कर्ज लिया हो और वह ऐसा व्यहार करते हैं जैसे इस देश के कानूनी तौर पर यही लोग मालिक है’। कुछ कहते हैं हम आरक्षित वर्ग से हैं इसकी जानकारी क्यों चाहिए? कुछ कहते हैं हमारी जाति का उल्लेख वाला कालम क्यों नहीं है? कुछ कहते हैं केवल संवर्ग दर्शायें जाति नहीं। जब प्रगणक उन्हें बताता है कि इसमें केवल संवर्ग है जाति नहीं तब वे किसी तरह से आगे के प्रश्नों के उत्तर देते हैं। कुछ तो प्रश्नों के उत्तर देते समय ही बीच में ही गुस्सा हो जाते हैं और कहते हैं हमारे घर की इतनी सारी जानकारी आप को क्यों दें।हम अपनी जनगणना नहीं कराएंगे। फिर प्रगणक उन्हें छोटे बच्चों की तरह बहुत ही स्नेह से समझा बुझाकर घंटों मेहनत करके एक-एक प्रश्नों के उत्तर उनसे पूछकर घर की जनगणना करता है।वह कड़ी धूप और कभी-कभी बे मौसम बारिश और तूफान भी झेल रहा है।इसीलिए मुझे राहत इंदौरी की शायरी याद आ रही है-
हों लाख जुल्म मगर बद्दुआ नहीं दें, जमीन मॉ है, जमी को दगा नहीं देंगे,
हमें तो सिर्फ, जगाना है सोने वालों को,
जो दर खुला है वहॉ हम सदा नहीं देंगे।

लेकिन सौ में से 99 प्रतिशत लोग सम्मानपूर्वक जनगणना कराना चाहते हैं , लेकिन जिस प्रकार एक सड़ा हुआ आम पूरी टोकरी के आम को खराब कर देता है। उसी प्रकार एक आदमी की नकारात्मक सोच की वजह से दूसरे लोग भी जनगणना में सहयोग नहीं कर रहे हैं। फिर भी प्रगणक अपनी सकारात्मक सोच से राष्ट्रीय कर्तव्य को बखूबी निभा रहा है। वह नौतपा में भी 12 से 18 घंटे ड्यूटी पर तैनात है इसी वजह से वह बीमार भी हो रहा है। क्योंकि वह चाहता है कि किसी भी घर की जनगणना न छूटे।समर वेकेशन की वजह से बहुत से घर बंद हैं लोग छुट्टियों में गाँव या किसी हिल स्टेशन गये हुए हैं ऐसे में प्रगणक को बार-बार बंद घरों की गणना हेतु जाना पड़ रहा है। सबसे बड़ा आश्चर्य इस बात का होता है कि पढ़े-लिखे लोगों ने स्व-गणना (Self Enumeration) न के बराबर की है जब कि भारत सरकार ने पोर्टल के माध्यम से अपनी स्वयं की जानकारी हेतु 1 मई, 2026 से 15 मई, 2026 तक समय निर्धारित किया था।यह प्रक्रिया पूरी तरह से डिजिटल है। डिजिटल होने की वजह से यह काम बहुत ही सरल है। लेकिन कुछ लोगों के असहयोग की वजह से यह जटिल बन चुकी है। ऐसे में प्रगणक(जनगणना अधिकारी) के सम्मान और स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है।
समझ में नहीं आता कौन इज़्ज़त दे रहा है, कौन बद्दुआ दे रहा है, कुछ चेहरे इस कदर मासूम हैं कि दोनों एक जैसे लगते हैं!

चंद्रवीर बंशीधर यादव
(लेखक मुंबई, महाराष्ट्र के शिक्षाविद् एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

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