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भगवान बेचारा क्या करे?

एम एम एस

‘अब सिर्फ भगवान ही भारतीय लोकतंत्र को बचा सकते हैं!’, सुप्रीम कोर्ट के ताजातरीन पैâसले पर पूर्व सांसद जवाहर सरकार का यह बयान पढ़कर वैकुंठ लोक में हड़कंप मच गया है। भगवान ने तुरंत नारद मुनि को बुलाकर पूछा, ‘ये मृत्युलोक वाले अपनी हर नाकामी का ठीकरा मेरे नाम क्यों फोड़ देते हैं?’
देखा जाए तो भगवान की चिंता जायज है।
बेचारे भगवान करें तो क्या करें? उनके पास न तो कोई वोटर आईडी है और न ही उनका नाम किसी राज्य की मतदाता सूची में शामिल है। कल को अगर वे लोकतंत्र बचाने धरती पर उतर भी आएं, तो ‘चुनावी शुद्धिकरण’ (एसआईआर) की इस अपारदर्शी ‘गंगा’ से वे खुद को वैâसे बचाएंगे? साक्ष्य और पारदर्शिता के इस दौर में, अगर चुनाव आयोग ने उनसे ‘स्थानीय नागरिकता का प्रमाण’ मांग लिया, तो ब्रह्मांड के रचयिता भी ‘सस्पीसियस’ सिटिजन की श्रेणी में खड़े नजर आएंगे।
देश में डिजिटल क्रांति का डंका बज रहा है, पर जब करोड़ों वोटरों के नाम अचानक गायब हो जाते हैं, तो ठीकरा कंप्यूटर सिस्टम पर नहीं, सीधे ‘विधाता’ के मत्थे मढ़ दिया जाता है। विपक्ष चिल्ला रहा है कि ‘ब्लैंक चेक’ मिल गया, एक्टिविस्ट इसे न्यायपालिका का ‘काला दिन’ बता रहे हैं, और एक नेताजी कह रहे हैं कि डेमोक्रेसी का आखिरी पिलर भी ढह गया। अब जब सारे लोकतांत्रिक स्तंभ आराम फरमाने चले गए हैं, तो सारा बोझ अकेले भगवान के कंधों पर डाल दिया गया है।
लोकतंत्र के निचले स्तर पर यह डिलीशन्स का खेल चल रहा है। अंडर-रिपोर्टिंग के इस दौर में, जहां लाखों नाम चुपचाप हट जाते हैं, वहां भगवान भी अब ‘स्मार्ट’ हो चुके हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि जिस देश में ईवीएम की सुरक्षा और मतदाता सूची की शुचिता पर अदालतें मुहर लगा चुकी हों, वहां बिना ‘सुरक्षा उपायों’ के दखल देना खुद को संकट में डालना है। अगर भगवान ने किसी का वोटिंग राइट वापस दिलाने की पैरवी कर दी, तो उन पर भी चुनावी प्रक्रिया में ‘अनवांटेड इंटरफियरेंस’ का मामला दर्ज हो सकता है।
इसलिए, हे देश के प्रबुद्ध नागरिकों! भगवान को अपने हाल पर छोड़ दीजिए। वे पहले से ही परीक्षा के पेपर लीक रुकवाने, गिरते रुपये को झाड़-फूंक से बचाने और वीआईपी वैâदियों की पैरोल मैनेज करने जैसी ‘अति-महत्वपूर्ण’ प्राकृतिक आपदाओं में परेशान हैं, क्योंकि ले दे के ( बात अच्छी हो या बुरी) हर कोई अंत में उन्हीं के नाम पर बिल फाड़ने लगता है!
अब जब देश की व्यवस्था ने खुद ही ‘ब्लैंक चेक’ पर दस्तखत कर दिए हों, तो बेचारा भगवान अपनी तरफ से कोई नई गारंटी वैâसे दे सकता है? आखिरकार, इस बेकाबू चुनावी खेल में अब वही बचेगा, जिसका नाम ‘सिस्टम’ की डायरी में दर्ज होगा, विधाता की किताब में नहीं!

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