तौसीफ कुरैशी
-सवाल सरकार से है, अफवाह से नहीं
-जब सरकार कहती है कि सब कुछ नियंत्रण में है, तब जनता यह भी जानना चाहती है कि नियंत्रण किस कीमत पर हासिल किया गया है।
-फिर ऐसी कौन-सी मजबूरी आ गई कि सोने की बिक्री जैसी चर्चा उठ खड़ी हुई? और अगर यह चर्चा निराधार है तो उसे तथ्यों के साथ खत्म क्यों नहीं किया जाता?
लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत जनता का भरोसा होता है और भरोसा तब बनता है, जब सरकार सवालों से भागती नहीं, उनका जवाब देती है। लेकिन इन दिनों एक सवाल हवा में तैर रहा है, क्या भारत का १.१४ लाख करोड़ रुपए का सोना बेच दिया गया? यह सवाल किसी चाय की दुकान पर बैठा आदमी नहीं पूछ रहा। यह सवाल उस रिपोर्ट के बाद उठा है, जिसे दुनिया की प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी ब्लूमबर्ग ने प्रकाशित किया।
अब मान लीजिए कि रिपोर्ट गलत है। तब भी सवाल खत्म नहीं होता, बल्कि पहला सवाल वहीं से शुरू होता है। अगर खबर गलत है तो सरकार सामने आकर साफ-साफ क्यों नहीं कहती कि यह झूठ है? वित्त मंत्री और आरबीआई गवर्नर संयुक्त प्रेस वार्ता करके देश को भरोसा क्यों नहीं दिलाते? क्योकि उस रिलीज में भी झूठ का सहारा लिया गया, उसके आंकड़े झूठ को खुद बयान कर रहे हैं। अप्रैल तक के आंकड़े दिए गए हैं, जबकि रिपोर्ट मई में बेचने की बात कर रही है। लोकतंत्र में संदेह का इलाज चुप्पी नहीं, पारदर्शिता होती है। हमारे देश का इतिहास गवाह है कि संकट के समय भी सच बोला गया। १९९१ में भारत गंभीर आर्थिक संकट में था। विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खाली हो चुका था। उस समय सोना गिरवी रखने का पैâसला हुआ। उस पैâसले पर बहस हुई, आलोचना हुई, लेकिन देश से सच्चाई नहीं छुपाई गई। जनता को बताया गया कि हालात कठिन हैं और सरकार असाधारण कदम उठा रही है। आज स्थिति अलग है। अर्थव्यवस्था को दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बताया जाता है। विदेशी मुद्रा भंडार के रिकॉर्ड स्तर के दावे किए जाते हैं। फिर ऐसी कौन-सी मजबूरी आ गई कि सोने की बिक्री जैसी चर्चा उठ खड़ी हुई? और अगर यह चर्चा निराधार है तो उसे तथ्यों के साथ खत्म क्यों नहीं किया जाता?
सरकार समर्थक कह रहे हैं कि आरबीआई का सोना नहीं बिका। मान लिया, लेकिन सवाल यहीं समाप्त नहीं होता। क्या किसी अन्य स्रोत का सोना बेचा गया? लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना देशद्रोह नहीं होता, बल्कि सवाल न पूछना लोकतंत्र के प्रति अन्याय होता है। इसलिए यह बहस किसी दल या नेता की नहीं, जवाबदेही की है। आखिर देश की संपत्ति के बारे में देश को जानकारी क्यों नहीं दी जा रही? जब तक स्पष्ट उत्तर नहीं आता, तब तक संदेह का धुंधलका बना रहेगा। और लोकतंत्र में धुंधलका हमेशा सत्ता से ज्यादा जनता को नुकसान पहुंचाता है।
लोकतंत्र में चुप्पी कभी
जवाब नहीं होती!
सवाल केवल इतना नहीं है कि सोना बिका या नहीं बिका। उससे भी बड़ा सवाल यह है कि अगर ऐसा हुआ तो उसके बदले प्राप्त धन कहां गया? आखिर १.१४ लाख करोड़ रुपए कोई छोटी रकम नहीं है। यह कई राज्यों के वार्षिक बजट से अधिक धनराशि है। इसलिए जनता का यह पूछना स्वाभाविक है कि उसका हिसाब कौन देगा।
बताया जा रहा है कि रुपए को संभालने और विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप के लिए बड़े पैमाने पर संसाधनों का इस्तेमाल हुआ। लेकिन आम आदमी यह देख रहा है कि रुपया लगातार दबाव में है। महंगाई का असर उसकी जेब पर है। आयात महंगा हो रहा है। ऐसे में यदि सचमुच इतना बड़ा आर्थिक हस्तक्षेप हुआ था, तो उसका परिणाम कहां दिखाई दे रहा है? लोकतंत्र में आर्थिक नीतियां केवल आंकड़ों का खेल नहीं होतीं। वे जनता के जीवन से जुड़ी होती हैं। जब सरकार कहती है कि सब कुछ नियंत्रण में है, तब जनता यह भी जानना चाहती है कि नियंत्रण किस कीमत पर हासिल किया गया है। अगर सोना नहीं बिका तो विस्तृत तथ्य सामने रखे जाएं। अगर बिका तो कारण बताए जाएं। आखिर सच छुपाने से कौन-सा राष्ट्रीय हित सुरक्षित होता है?
आज समस्या केवल आर्थिक नहीं है। समस्या भरोसे की है। जब सरकार जवाब नहीं देती, तब अफवाहें जवाब देने लगती हैं। जब तथ्य सामने नहीं आते, तब अनुमान सच की जगह लेने लगते हैं। यही कारण है कि एक रिपोर्ट पूरे देश में चर्चा का विषय बन जाती है। देश की जनता को न तो डराने की जरूरत है और न बहलाने की। उसे सिर्फ सच चाहिए। सच चाहे सरकार के पक्ष में हो या विपक्ष के। क्योंकि अर्थव्यवस्था किसी दल की नहीं होती, पूरे देश की होती है। सोना भी किसी सरकार का नहीं, राष्ट्र की सामूहिक संपत्ति है। इसलिए दो सवाल आज भी खड़े हैं और उनका उत्तर सरकार को देना चाहिए।
सत्यमेव जयते
