चुनाव आयोग ने शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह को लेकर अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर पैâसला दिया। आयोग ने केवल शिंदे गुट को फायदा पहुंचाने का काम किया। इसी के चलते दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य ठहराए जाने वाले व्यक्ति को केवल विधायकों की संख्या के आधार पर मुख्यमंत्री बना दिया गया। उस व्यक्ति ने पद, सत्ता और सत्ता से मिलने वाले अन्य लाभों का फायदा उठाया, ऐसा गंभीर दावा वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कल सर्वोच्च न्यायालय में किया। लगातार पांचवें दिन जोरदार दलीलें पेश करते हुए सिब्बल ने चुनाव आयोग के फैसले पर तीखे सवाल उठाए।
विधायकों को अयोग्य ठहराया होता तो शिवसेना का ही बहुमत होता
-सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल की दलील
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि न्यायमूर्ति धनंजय चंद्रचूड़ की संविधान पीठ ने आयोग को पहले पार्टी और चुनाव चिन्ह पर पैâसला लेने की अनुमति दी थी। संविधान पीठ के उस पैâसले की सात न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ द्वारा पुनर्विचार किया जाना जरूरी है। यदि विधानसभा अध्यक्ष ने गद्दार विधायकों को अयोग्य ठहरा दिया होता तो शिवसेना का ही बहुमत कायम रहता, सिब्बल ने न्यायालय के समक्ष यह दलील दी।
शिवसेना के पार्टी और चुनाव चिन्ह से जुड़े मामले में चुनाव आयोग के पैâसले को शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है। वहीं, गद्दार विधायकों की अयोग्यता को लेकर पार्टी के मुख्य सचेतक सुनील प्रभु ने भी याचिका दाखिल की है। इन याचिकाओं पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ के समक्ष अंतिम सुनवाई चल रही है।
गुरुवार को सिब्बल ने करीब दो घंटे तक दलीलें पेश कीं और चुनाव आयोग की कथित कानूनी खामियों को न्यायालय के सामने रखा। उन्होंने कहा कि शिंदे गुट की गद्दारी के बाद की घटनाओं को ध्यान में न रखने का निर्देश न्यायालय ने दिया था। इसके बावजूद चुनाव आयोग ने उन्हीं घटनाओं को आधार बनाकर पार्टी और चुनाव चिन्ह पर पैâसला सुनाया। सिब्बल ने कहा कि आयोग ने जनता दल से जुड़े १९९४ के मामले का हवाला दिया, लेकिन शिवसेना के मामले में उस पैâसले का कोई संबंध नहीं था। इसलिए उसका संदर्भ देना ही गलत था। दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य ठहराए जाने वाले व्यक्ति को केवल विधायकों की संख्या के आधार पर मुख्यमंत्री बनाया गया। सिब्बल ने न्यायालय को बताया कि यदि पार्टी में विभाजन को लेकर विवाद था तो पार्टी का पंजीकरण रद्द किया जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा करने के बजाय पार्टी और चुनाव चिन्ह शिंदे गुट को सौंप दिया गया।
उन्होंने यह भी दोहराया कि एकनाथ शिंदे ने गद्दारी के बाद शिवसेना के २०१८ के पार्टी विधान को मानने से इनकार किया था, जबकि इसी विधान के आधार पर वह पहले विधायक और मंत्री बने थे। खंडपीठ ने सिब्बल की दलीलों को दर्ज करते हुए मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को निर्धारित की है।
