सैयद सलमान / मुंबई
सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच मक्का में हुए संयुक्त रक्षा समझौते ने पश्चिम एशिया की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इस बहुप्रचारित रक्षा समझौते में यह शर्त रखी गई कि इन तीनों में से किसी भी एक देश पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा। इसी के चलते मीडिया और सोशल मीडिया पर इसे ‘इस्लामिक नाटो’ कहने की होड़ मच गई।
सिर्फ सियासी गठजोड़
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने कुछ ही दिन बाद इस दावे पर पानी फेर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह समझौता किसी देश, खासकर ईरान के खिलाफ नहीं है और यह भी कहा कि एक पर हमला तीनों पर हमला माना जाए, यह जरूरी नहीं है। इस प्रकार, जिस अनुच्छेद-५ जैसी सामूहिक सुरक्षा गारंटी के आधार पर पूरा प्रचार खड़ा किया गया, उसी की नींव तुर्किये ने स्वयं हिला दी। यह विरोधाभास इस बात का प्रमाण है कि यह करार अभी सिद्धांत से अधिक एक राजनीतिक गठजोड़ मात्र है।
नाटो को नाटो बनानेवाली चीज केवल कागज पर लिखा समझौता नहीं है। उसके पीछे सात दशकों का साझा सैन्य ढांचा, संयुक्त कमान, नियमित अभ्यास और आपसी विश्वास की मजबूत परत है। सदस्य देशों के हित हर मुद्दे पर एक जैसे नहीं होते, फिर भी गठबंधन की बुनियाद नहीं डगमगाती। मक्का समझौता अभी इस कसौटी से बहुत दूर है। यह तीन देशों का स्थायी सैन्य संगठन न होकर, सिर्फ सामरिक साझेदारीभर है।
असली परीक्षा
फिर भी इस गठजोड़ को हल्के में नहीं लेना चाहिए। इसके पीछे खाड़ी क्षेत्र की बदलती सुरक्षा तस्वीर काम कर रही है। लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य तक पैâले संघर्ष ने खाड़ी देशों को अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर पहले जैसा भरोसा नहीं रहने दिया है। सऊदी अरब को स्वयं सुरक्षा के नए विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं। उसके पास आर्थिक ताकत, ऊर्जा संसाधन और अरब दुनिया में महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रभाव है। तुर्किये के पास ड्रोन, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की आधुनिक तकनीक है, जबकि पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार और सैन्य क्षमता है। तीनों की जरूरतें अलग हैं। लेकिन फिलहाल स्वार्थ एक बिंदु पर मिल रहे हैं, यही इस करार की असली बुनियाद है।
सबसे बड़ा सवाल पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर टिका है। सऊदी अरब के साथ उसका द्विपक्षीय रक्षा समझौता २०२५ में ही हो चुका था, अब वह इसे तीन देशों के गठजोड़ के रूप में और बड़ा दिखाने की कोशिश में है। पाकिस्तान की आदत रही है कि वह एक साथ कई शक्ति केंद्रों से नाता जोड़े रखता है। अमेरिका का गैर-नाटो सहयोगी, चीन का घनिष्ठ साझेदार और अब खाड़ी और तुर्किये के साथ नया सुरक्षा ढांचा। बहुस्तरीय कूटनीति में कोई बुराई नहीं, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब हर साझेदारी को ‘दोस्ती’ का नाम दे दिया जाए। पाकिस्तान की डूबती अर्थव्यवस्था सऊदी निवेश की मोहताज है, जबकि चीन पर उसकी रणनीतिक निर्भरता किसी से छिपी नहीं। संकट की घड़ी में वह किसका साथ चुनेगा, यही उसकी असली परीक्षा होगी।
अपनी-अपनी खुदगर्जी
सऊदी अरब के लिए यह करार किसी धार्मिक सैन्य मोर्चे से अधिक अपनी सामरिक क्षमता बढ़ाने की कोशिश लगता है। विजन-२०३० के दौर में उसे स्थिरता चाहिए। वह युद्धों में उलझना नहीं चाहेगा। तुर्किये के इरादे थोड़े अलग हैं। नाटो सदस्य होने के बावजूद वह मुस्लिम दुनिया में अपना कद बढ़ाने का अवसर देख रहा है। अगर यह सचमुच ‘इस्लामिक नाटो’ है तो संयुक्त अरब अमीरात, कतर, मिस्र, जॉर्डन और इंडोनेशिया जैसे बड़े मुस्लिम देश इससे दूरी क्यों बनाए हुए हैं? इन देशों की विदेश नीति किसी एक सैन्य धुरी से बंधने के बजाय कई शक्ति केंद्रों के साथ संतुलन साधने पर टिकी है। ईरान की अनुपस्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। भले ही समझौते में उसका नाम न लिया गया हो, ईरान इसे अपने खिलाफ बनते घेरे के रूप में देख सकता है, जिससे क्षेत्र में पहले से मौजूद शिया-सुन्नी तनाव और गहरा सकता है। भारत के लिए इस गठजोड़ पर जल्दबाजी में राय बनाना उचित नहीं है। असली सवाल नाम का नहीं, बल्कि अमल का है। भारत को नजर रखनी होगी कि तीनों देश इस करार को व्यवहार में कितना निभाते हैं।
कुल मिलाकर, मक्का समझौता बदलती भू-राजनीति का संकेत जरूर है, पर इसे ‘इस्लामिक नाटो’ कह देना जल्दबाजी होगी। जो इमारत विश्वास और संस्थाओं के बजाय तात्कालिक स्वार्थ की रेत पर खड़ी हो, उसे पहले तेज झोंके का इंतजार करना बाकी है। इस साझेदारी की असली परीक्षा उस दिन होगी जब किसी एक सदस्य के सामने वास्तविक संकट खड़ा होगा। तब पता चलेगा कि मक्का में बनी यह साझेदारी सिर्फ तीन देशों का रणनीतिक सौदा है या सचमुच एक नए सुरक्षा ढांचे की शुरुआत।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
