हिमांशु राज
-२०२७ में सत्ता की चाबी किसके हाथ?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब एक साधारण लेकिन निर्णायक सत्य उभरकर सामने आया है। वह पार्टी जो दलित, मुस्लिम और अति पिछड़े (ओबीसी) मतदाताओं का संगठित समर्थन प्राप्त कर लेगी, वही शासन पर काबिज होगी। २०२२ के विधानसभा चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कई सीटों पर मुस्लिम आबादी ४५-५० प्रतिशत होते हुए भी समाजवादी पार्टी अपेक्षित सफलता नहीं पा सकी। इसका केवल कारण गठबंधन का अभाव नहीं था; सपा के कोर वोटर बेस का क्षीण होना और अन्य पिछड़ों तथा दलितों का खुले रूप से सपा के विरोध में खड़ा होना निर्णायक साबित हुआ। यही असमंजस २०२७ में सपा के लिए चुनौती बन सकता है यदि उसने अपने समर्थन आधार को फिर से मजबूत न किया।
उत्तर प्रदेश की अधिकांश विधानसभा सीटों पर कुछ शहरी क्षेत्र छोड़कर दलित वोटर २०–३० प्रतिशत तक मौजूद हैं। जब हर सीट पर इतना प्रभावशाली दलित मत पहले से उपस्थित हो और यदि मुस्लिम व अति पिछड़ों का संयुक्त प्रभाव जुड़ जाए तो चुनावी समीकरण स्वाभाविक रूप से ६०-६५ प्रतिशत से बढ़ने लगता है। इस स्थिति में तीनों समूहों की एकीकृत प्राथमिकता किसी भी प्रत्याशी या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत दिला सकती है।
भाजपा की हालिया सफलताओं का विश्लेषण यह दर्शाता है कि कई स्थानों पर अन्य पिछड़े और दलित सीधे मुस्लिम विरोध के कारण नहीं, बल्कि समाजवादी विकल्प से असंतोष और नेतृत्व‑प्रस्ताव की कमजोर धारणा के चलते भाजपा के साथ खड़े रहे। समस्या सामूहिक वैमनस्य की नहीं, बल्कि सपा के प्रति विश्वासहीनता और प्रत्याशी‑प्रक्रिया की पारदर्शिता न रहने से जुड़ी रही।
