तौसीफ कुरैशी
देश की सबसे बड़ी चिकित्सा प्रवेश परीक्षा र्EEऊ-ळउ २०२६ का पेपर लीक का फिर दाग लग गया है। सरकार लगातार लीपा-पोती कर मामले को डायवर्ट करने की हर संभव कोशिश कर रही है, लेकिन कर नहीं पा रही है। आखिर बच्चों के भविष्य का सवाल है, वहीं शिक्षा मंत्रालय की शिकायत पर ण्ँघ् ने इघ्R दर्ज कर ली है। धाराएं भी मामूली नहीं हैं आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, सबूत मिटाने से लेकर सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम तक। सरकार कह रही है कि दोषियों को छोड़ा नहीं जाएगा। विशेष टीमें बन गई हैं, जांच शुरू हो गई है, बयान आ रहे हैं, प्रेस नोट जारी हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल जांच से उस भरोसे की वापसी हो जाएगी, जो लाखों युवाओं की आंखों से रिस चुका है? हम ऐसे समय में खड़े हैं जहां परीक्षा अब केवल परीक्षा नहीं रही। यह गरीब किसान के बेटे की उम्मीद है, रिक्शा चलाने वाले पिता की कमाई है, मां की अधूरी इच्छाओं का संकल्प है। बिहार के गांव से लेकर राजस्थान के कस्बों तक, बच्चे रात-दिन पढ़ते हैं। कोई कोटा की कोचिंग में जलता है, कोई मिट्टी के घर में लालटेन तले सपने लिखता है। और फिर एक सुबह खबर आती है कि पेपर लीक हो गया।
उस क्षण केवल प्रश्नपत्र नहीं लीक होता, लोकतंत्र का नैतिक आधार भी रिसने लगता है। हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि भ्रष्टाचार है, भ्रष्टाचार तो पहले भी था। दुख इस बात का है कि अब शर्म नहीं बची। हर घोटाले के बाद एक तयशुदा पटकथा चलती है सरकार कहती है कि ‘कड़ी कार्रवाई होगी’, विपक्ष कहता है ‘इस्तीफा दो’, एजेंसियां जांच बैठाती हैं, टीवी चैनल बहस सजाते हैं। नामचारे के लिए गोदी मीडिया सरकार का ही राग अलापते दिखते हैं, सोशल मीडिया जाति और धर्म के खांचों में मुद्दे को बांट देता है। कुछ दिनों बाद नया शोर आ जाता है और पुराना सच धूल में दब जाता है। लेकिन इस बार मामला अलग है। यह केवल किसी सड़क, पुल या ठेके का भ्रष्टाचार नहीं है। यह उन युवाओं के भविष्य का प्रश्न है, जिन्हें देश का डॉक्टर बनना था। जिन बच्चों ने दो-दो साल घर छोड़कर तैयारी की, जिन परिवारों ने जमीन गिरवी रख दी, उनके साथ अगर यह छल हुआ है तो यह केवल अपराध नहीं, सामाजिक विश्वासघात है। आज सरकारें विकास की भाषा कम और भावनाओं की राजनीति अधिक बोलती दिखाई देती हैं नफरत के बाजार में नफरत की दुकानें सजती हैं। विकास कठिन काम है। उसमें स्कूल बनाने पड़ते हैं, विश्वविद्यालयों को ईमानदार बनाना पड़ता है, परीक्षा संस्थाओं को पारदर्शी करना पड़ता है। लेकिन नफ़रत का खेल आसान है। उसमें केवल भीड़ चाहिए, नारे चाहिए और लगातार ऐसा वातावरण चाहिए, जिसमें नागरिक सवाल पूछना भूल जाए वही हो रहा है। यही कारण है कि जब बेरोजगारी बढ़ती है, परीक्षाएं लीक होती हैं, संस्थाएं कमजोर पड़ती हैं, तब बहस का केंद्र बदल दिया जाता है। कभी मंदिर-मस्जिद, कभी खान-पान, कभी भाषा, कभी कपड़े ऐसे ही ऊलजलूल मुद्दों से जनता का ध्यान वहां टिकाया जाता है, जहां भावनाएं उबलें, ताकि वह यह न पूछें कि शिक्षा व्यवस्था क्यों सड़ रही है। किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी परीक्षा प्रणाली की ईमानदारी पर टिका होता है। अगर युवाओं को यह लगने लगे कि मेहनत से ज्यादा कीमत जुगाड़ की है, तो समाज की आत्मा टूट जाती है। तब प्रतिभा पलायन करती है और अवसर दलालों के हाथों बिकने लगते हैं। यह केवल शिक्षा का संकट नहीं, राष्ट्र निर्माण का संकट है। ण्ँघ् की जांच जरूरी है। दोषियों को सजा मिलनी चाहिए मगर मिलेगी नही। लेकिन क्या केवल गिरफ्तारी से समस्या खत्म हो जाएगी? पिछले वर्षों में भी कई प्रतियोगी परीक्षाओं पर सवाल उठे। हर बार कुछ छोटे चेहरे पकड़ लिए गए, लेकिन वह तंत्र बचा रहा जो ऐसे अपराधों को जन्म देता है। जब तक परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, जब तक राजनीतिक संरक्षण और कोचिंग माफिया के गठजोड़ पर चोट नहीं होगी, तब तक यह सिलसिला रुकने वाला नहीं। लोकतंत्र में सरकार केवल सत्ता चलाने के लिए नहीं चुनी जाती। सरकार जनता के भरोसे की संरक्षक होती है। अगर लाखों युवाओं का भरोसा टूट रहा है तो सरकार यह कहकर नहीं बच सकती कि ‘जांच चल रही है।’ जिम्मेदारी केवल अपराधियों की नहीं, व्यवस्था की भी होती है। और व्यवस्था का चेहरा अंतत: सरकार ही होती है। आज देश के सामने असली प्रश्न यही है हम वैâसा भारत बनाना चाहते हैं? वह भारत जहां बच्चे धर्म देखकर एक-दूसरे से नफरत करना सीखें या वह भारत जहां गरीब का बेटा भी ईमानदारी से डॉक्टर बन सके? चुनाव जनता को करना है। नफरत का रास्ता ताली बजवाता है, लेकिन विकास का रास्ता भविष्य बनाता है। एक समाज तब मजबूत होता है जब उसकी युवा पीढ़ी को न्याय पर भरोसा हो। अगर यह भरोसा खत्म हो गया तो केवल परीक्षा प्रणाली नहीं टूटेगी, लोकतंत्र की आत्मा भी घायल होगी। इसलिए र्EEऊ का यह मामला केवल एक लीक नहीं, देश के विवेक की परीक्षा है। और इस परीक्षा में केवल छात्र नहीं, सरकार भी बैठी है।
सत्यमेव जयते
लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल जांच से उस भरोसे की वापसी हो जाएगी, जो लाखों युवाओं की आंखों से रिस चुका है? हम ऐसे समय में खड़े हैं जहां परीक्षा अब केवल परीक्षा नहीं रही। यह गरीब किसान के बेटे की उम्मीद है, रिक्शा चलाने वाले पिता की कमाई है, मां की अधूरी इच्छाओं का संकल्प है। बिहार के गांव से लेकर राजस्थान के कस्बों तक, बच्चे रात-दिन पढ़ते हैं।
