मुख्यपृष्ठस्तंभमहाराष्ट्रनामा : महंगाई का सिलेंडर, तूफान की चेतावनी और तस्करों का राष्ट्रधर्म!

महाराष्ट्रनामा : महंगाई का सिलेंडर, तूफान की चेतावनी और तस्करों का राष्ट्रधर्म!

राजन पारकर

जनता रो रही है, सत्ता सो रही है और व्यवस्था अपनी ही जेब टटोल रही है! देश में इस समय तीन ही चीजें सबसे तेज दौड़ रही हैं- महंगाई, तूफान और तस्करी! फर्क सिर्फ इतना है कि महंगाई जनता की जेब उड़ाती है, तूफान छत उड़ाता है और तस्करी व्यवस्था का मुखौटा उड़ाती है।
पेट्रोल-डीजल के बाद अब गैस सिलेंडर भी जनता की जेब पर ऐसे टूट पड़ा है जैसे सरकार को घर-घर में रोटी बनते देख कोई एलर्जी हो गई हो। २९ रुपए की बढ़ोतरी को कागज पर मामूली बताने वाले शायद यह भूल जाते हैं कि जिनके घरों में आय नहीं बढ़ती, उनके लिए एक रुपया भी महंगाई का हथौड़ा बनकर गिरता है।
शरद पवार ने सरकार को चेतावनी दी है कि जनता की सहनशीलता की भी एक सीमा होती है। लेकिन सत्ता के गलियारों में शायद यह मान लिया गया है कि जनता की जेब रबर की बनी है, जितना खींचो उतनी लंबी हो जाएगी। आज हालत यह है कि सिलेंडर का वजन पहले गैस से मापा जाता था, अब उसकी कीमत देखकर लोगों की सांसें भारी हो जाती हैं।
बादल गरज रहे हैं, हवाएं चीख रही हैं और प्रशासन प्रेस नोट लिख रहा है!
मानसून आया नहीं कि मौसम विभाग ने १७ राज्यों को चेतावनी दे डाली। ८० से ९० किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलेंगी। प्रकृति मानो कह रही है- ‘जब इंसानों ने सब कुछ उखाड़ने का ठेका ले लिया है तो मैं पीछे क्यों रहूं?’ एक तरफ तूफानी हवाएं पेड़ गिराएंगी, दूसरी तरफ महंगाई जनता की कमर तोड़ेगी। मजे की बात यह है कि हर साल चेतावनियां समय पर आती हैं, लेकिन तैयारी हमेशा देर से पहुंचती है।
बारिश शुरू होते ही सड़कें तालाब बन जाती हैं, नाले नदियां बन जाते हैं और अधिकारी समीक्षा बैठकें करने लगते हैं। लगता है हमारे यहां आपदा प्रबंधन का मतलब आपदा आने के बाद प्रबंधन करना ही रह गया है।
तस्करी का कारोबार और नैतिकता का दिवालियापन!
मुंबई में तस्करी मामले में भाजपा नेता और श्रमिक संगठन से जुड़े पदाधिकारी की गिरफ्तारी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। देशभक्ति के भाषण देने वाले कुछ लोग जब तस्करी के आरोपों में पकड़े जाते हैं तो राष्ट्रवाद भी कुछ देर के लिए शर्मिंदा होकर कोने में खड़ा हो जाता है। डीआरआई की कार्रवाई में जो कबाड़ा मिला है, वह सिर्फ माल का नहीं, बल्कि व्यवस्था में घुसी हुई उस मानसिकता का भी है जो कानून को गरीबों के लिए और जुगाड़ को अमीरों के लिए मानती है।
राजनीति, व्यापार और अपराध का यह त्रिकोण अब इतना मजबूत हो चुका है कि जनता को अक्सर समझ ही नहीं आता कि नेता कौन है, कारोबारी कौन है और आरोपी कौन है।
एक तरफ गैस महंगी है, दूसरी तरफ तूफान की मार है और तीसरी तरफ तस्करी के खुलासे हैं। जनता पूछ रही है-‘क्या देश चल रहा है या प्रयोगशाला बन गया है?’ सत्ता जवाब देती है — ‘सब नियंत्रण में है।’ लेकिन जनता का खाली बटुआ, बारिश में डूबती सड़कें और रोज सामने आते घोटाले कुछ और ही कहानी सुना रहे हैं। देश की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि संकट चाहे किसी भी रूप में आए, उसकी कीमत हमेशा आम आदमी ही चुकाता है।

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