परमात्मा को पाने का एक ही मार्ग है
— अपने भीतर लौट जाना।
जब तक तुम बाहर खोजते हो,
तुम संसार के शोर में खोए रहते हो।
अंतर्मुख होने पर ही मौन का द्वार खुलता है।
परमात्मा कोई वस्तु नहीं, जिसे पाया जाए;
वह तुम्हारी ही चेतना का सबसे शुद्ध फूल है।
जब मन शांत होता है, वही फूल स्वतः खिल उठता है।
मार्ग कठिन नहीं, बस अहंकार छोड़ना कठिन है।
जहां अहंकार गिरता है, वहीं परमात्मा प्रकट होता है।
और जहां प्रेम होता है, वहां उसकी उपस्थिति सदैव जीवित रहती है।
सद्गुरु से “आत्मज्ञान” प्राप्त करने पर सब कुछ सरल और सुगम है।
आर.डी. अग्रवाल “प्रेमी”
