-डॉ. रवीन्द्र कुमार
लेटेस्ट खबर यह है कि दरअसल पेपर लीक हुआ ही नहीं। केवल कुछ सवाल लीक हो जाने से यह कहना कि पूरा का पूरा पेपर लीक हो गया, एक तरह से असत्य वचन है। नाइंसाफी है। दूसरे शब्दों में, अगर किसी पेपर के दस सवालों में से छह-आठ सवाल ‘वाट्सऐप’ पर आ जाएँ, तो क्या यह तकनीकी तौर पर लीक कहलाएगा? सच तो यह है कि फ़र्ज़ करो पेपर में दस सवाल थे और दसों सवाल लीक हुए ही नहीं, तब पेपर लीक कैसे माना जाए? यह जो लीक है, यह हमारी ऐतिहासिक धरोहर है। देखिए, विभीषण ने यह लीक किया ही था न कि रावण को कहाँ तीर मारना है। महाभारत तो लीक से भरी हुई है।
देखिए, प्रश्न-पत्र में पहले तो एक हेडिंग लिखी होती है कि यह किस बात की और किस विषय की परीक्षा है। लीक में ये दोनों चीज़ें नदारद हैं, तब यह लीक कैसे हुआ है? न साल का ज़िक्र है, न तारीख का। पता नहीं कब का पेपर है? किस चीज़ का पेपर है? कब हुआ या होने वाला है? पेपर को प्रथम दृष्टया देखने से पता ही नहीं चलता, तब पेपर लीक कैसे माना जाए? पेपर द्विभाषी है, अर्थात हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों में है, जबकि जो सवाल लीक हुए हैं, वे केवल अंग्रेज़ी के हैं। तब यह ‘पेपर लीक’ कैसे हुआ? यह टेक्निकली पेपर लीक नहीं है। यूँ तो हम जब ‘चैम्पियन गैस पेपर’ स्कूल के ज़माने में खरीदते थे, तब कई सवाल थोड़े अदल-बदल कर मूल पेपर में होते थे। इसका अर्थ यह नहीं कि गैस पेपर वालों को आदरणीय अध्यापकों अथवा प्रिंसिपल महोदय ने, या लैब असिस्टेंट या चपरासी ने पेपर लीक कर दिया था।
यह और कुछ नहीं है, बस कुछ ‘कम्यूनिकेशन गैप’ है। यह लीक जो है, सो हमारे जीवन में कहाँ नहीं है। क्या बरसात में हमारी परछत्ती लीक नहीं करती? क्या हमारे फाउंटेन पेन लीक नहीं करते थे? हमने तो माताजी की गुल्लक में से चवन्नी-अठन्नी भी तार/पिन की मदद से लीक की है। अब पता चला, ए.टी.एम. अपने कोड नंबर को पिन क्यों कहते हैं। इस तरह चवन्नी या अठन्नी निकाल लेने को यह नहीं कह सकते कि पूरी गुल्लक लीक कर ली। बस इतने सारे सिक्कों में से कुछ सिक्के ही तो लीक हुए थे। फिर यह साबित भी नहीं होता कि ये चवन्नी-अठन्नी इसी गुल्लक में से निकली हैं।
हम भारतीय हैं। जुगाड़ हमारी ‘साइकी’ में इतने अंदर तक जड़ जमा चुका है कि लंबी ‘क्यू’ देखते ही हमारा दिल ‘क्यू’ में खड़े होने को नहीं करता, बल्कि इस जुगाड़ में लग जाता है कि कैसे या तो ‘क्यू’ तोड़ी जाए अथवा कैसे बिना ‘क्यू’ में लगे काम हो जाए। एयरपोर्ट पर अच्छे-भले भारतीय व्हीलचेयर पर बैठकर जाते हैं, ताकि प्राथमिकता के आधार पर विमान पर सवार हो जाएँ। वक़्त आ गया है कि अधिकारियों और नेताओं का 175 सदस्यीय दल ऐसे देश में जाए, जहाँ इस तरह की परीक्षाएँ बिना लीक हुए संचालित की जाती हैं। उनकी समस्या क्या है? वह कौन-सी चीज़ है, जो उन्हें पेपर लीक करने से रोकती है? लीक हमारी राष्ट्रीय समस्या नहीं है, अपना नज़रिया बदलिए। लीक हमारा राष्ट्रीय सॉल्यूशन है। लीक था, लीक है, लीक रहेगा। जिन खोजा तिन पाइयाँ। आप अपना-अपना देख लो।
